विपासना
चेतना की नदी देह के घाट से बहती है जब कभी
मन बाँध कर रख लेना चाहता है
मात्र अपने लिए
सड़ने लगता है बंधा हुआ पानी
जम जाती है शैवाल कहीं उठ जाती हैं चट्टानें
मन की अपरिमित लालसा की
हड़प जाने की वासना की
जब तब उठता है उबाल जिसमें
अकुलाता है मन का वह पानी
पर रित का नियम उसे थमने नहीं देता
कतरा-कतरा भेजता ही रहता है
देह के घाट तक
होश जगते ही सब स्पष्ट होने लगता है
राज बेचैनी का खुलने लगता है
टूट कर झरने लगती हैं दीवारें
कल-कल बहती जाती है नदी चेतना की...
