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मंगलवार, मई 6

नदी मन की

 नदी मन की


संकल्प और विकल्प
 दो तटों के मध्य
नदी बहती है
हम किनारों पर ही बैठे बैठे
देखते रहते, जान नहीं पाते
वह क्या कहती है !

कभी घने जंगलों से गुजरती
कभी कठोर स्थलों से फिसलती
हम लुटते-कटते, अंजान से बिंधते
देख नहीं पाते
वह क्या सहती है