बिन बाती इक दीप जला लें
मुट्ठी भर पल पास हमारे
अंजलि भर क्षण पाए सारे,
चाहे खो दें या फिर बो दें
वृक्ष उगा दें मन के द्वारे !
एक फूल अमृत का खिला दें
अमरबेल पादप लहरा दें,
खो जाएँ फिर नभ अनंत में
दिग दिगंत में सुरभि उड़ा दें !
मदहोशी जो होश जगा दे
परम शांति के फूल उगा दे,
रग-रग में फिर नृत्य समाये
कण-कण मन के ज्योति समा दे !
ऐसा एक रहस्य जान लें
जीते जी इक स्वर्ग बना दें,
अंधियारा मिट मिले उजास
बिन बाती इक दीप जला लें !
गीत चुके, पर वह असीम है
शब्द पुराने वह नवीन है,
पल-पल वह संवर्धित होता
परम प्रेम में वह प्रवीण है !
कह-कह कर भी कहा न जाये
सदा और, और हुआ जाये,
जितना हमने चाहा उसको
लाख गुना वह प्रेम जताए !
अनिता निहलानी
२७ नवम्बर २०१०
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