सोमवार, नवंबर 21

पार वह उतर गया


पार वह उतर गया


दर्पण सा मन हुआ
गगन भीतर झर गया

सहज सिद्ध प्रेम यहाँ
होश भीतर भर गया

हो सजग जो भी तिरा
पार वह उतर गया

पाप-पुण्य खो गए
वर्तमान हर गया

दिख रहा भ्रम ही है
भाव कोई भर गया

रिक्तता ही जग में है
व्यर्थ मन डर गया

मन जुड़ा जब झूठ से
सत्य फिर गुजर गया

पंचभूतों का प्रपंच
बोध चकित कर गया

सत्य है बहुमुखी
नव आयाम धर गया

मस्त हुई आत्मा
प्रीत कोई कर गया

डूबा जो वह तर गया
बच रहा वह मर गया



20 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुंदर आस्था प्रभु में ...
    आपकी रचनाएँ एक राह दिखाती हैं ....
    आभार.

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  2. हो सजग जो भी तिरा
    पार वह उतर गया

    बहुत सुन्दर भाव ... अच्छी प्रस्तुति

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  3. कल 22/11/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. आपकी रचनात्मक ,खूबसूरत और भावमयी
    प्रस्तुति आज के तेताला का आकर्षण बनी है
    तेताला पर अपनी पोस्ट देखियेगा और अपने विचारों से
    अवगत कराइयेगा ।

    http://tetalaa.blogspot.com/

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  5. छोटे छोटे छंदों में बनी ये मोहक सी कविता बड़ी प्यारी है |

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  6. दर्पण सा मन हुआ
    गगन भीतर झर गया
    अद्भुत बिम्ब परिकल्पना!!

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  7. आप सभी का आभार ! मनोज जी, आपका ब्लॉग आजकल मुझसे नहीं खुल रहा है, पिछले दो तीन दिनों से केवल नीला रंग देख व गीत ही सुनकर लौटना पड़ता है.

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  8. बहुत ही बढ़िया सार्थक अभिव्यक्ति....समय मिले कभी तो आयेगा मेरी पोस्ट पर आपका स्वागत है

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  9. हो सजग जो भी तिरा
    पार वह उतर गया
    वाह!
    बेहद सुन्दर रचना!

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  10. मर कर भी कुछ है जो फिर -फिर जिन्दा हो जाता है. आज तक मैं इस खेल को समझ नहीं पायी हूँ. वैसे आपने बेहद खुबसूरत लिखा है. बचा हुआ मर जाए तो क्या कहना.

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  11. हो सजग जो भी तिरा
    पार वह उतर गया

    वाह! कितनी सुन्दर रचना....
    सादर बधाई...

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  12. अमृताजी, जो मरकर भी नहीं मरता वह तो अमृत तत्व है... पर हम उसे बचाने का प्रयास करते हैं जो अहंकार है...मर मर कर फिर जी उठता है, जिसने इसे बचाया वह प्रभु की राह में मर गया.

    संजय जी, मनीष जी, अनुपमा जी व सुषमा जी आप सभी का आभार!

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  13. डूबा जो वह तर गया
    बच रहा वह मर गया....वाह! वाह! वाह!
    बेहद सुन्दर रचना.......

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  14. हो सजग जो भी तिरा
    पार वह उतर गया
    बहुत सरल व सुन्दर भाव...!!

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