मंगलवार, मई 18

बादलों के पार

बादलों के पार


उठे धरा से छूने अम्बर
मेघपुंज के पार आ गए
छूटी पीछे दो की दुनिया
इक का ही आधार पा गए I

दूर कहीं है गंध धरा की
स्वर्णिम क्षण यह दृश्य अनोखा
ढका गया बादल से हर कण
दिखे कहीं न कोई झरोखा I

निर्मल नीले नभ की छाया
श्वेत मेघ तिरते झलकाते
मानो बिखरी हो कपास शुभ्र
या उड़तीं बगुलों की पातें I

हिम आच्छादित पर्वत माला
ज्यों मीलों दूर चली जाती
श्वेत बादलों की यह शैया
परीलोक की याद दिलाती I

अनिता निहालानी
२६ मार्च २०१०

1 टिप्पणी: