सोमवार, मार्च 11

महाकुम्भ के समापन पर



महाकुम्भ के समापन पर

कल-कल छल-छल बहती गंगा
यमुना जिसमें आ कर मिलती,
यही त्रिवेणी है प्रयाग की
छुपी है जिसमें सरस्वती !

इस अति पावन तीर्थराज में
कुम्भ पर्व की शोभा न्यारी,
हरिद्वार, नासिक, प्रयाग में
तब उज्जैन की आती बारी !

देव उतर आते हैं भू पर
सूर्य, चन्द्र, गुरु भी मिलते,
घुल जाता है मानो अमृत
लाखों अंतर भाव से खिलते !

सूर्य मकर राशि में  होता
दिग दिगांतर हुए प्रफ्फुलित,
आए दूर से जन सैलाब
श्रद्धा के हों दीप प्रज्ज्वलित !

भगवद गाथा संत सुनाते
अद्भुत साधुजन आते हैं,
नव इतिहास गढ़ा जाता है
मिल कर सारे कुम्भ नहाते !

एक अजूबा है धरती का
 भारत भू का पर्व निराला,
नागा साधुओं के अखाड़े
इक तिलस्म सा ज्यों रच डाला 

17 टिप्‍पणियां:

  1. बढ़िया भाव आदरेया-
    सुन्दर प्रस्तुति-
    जय जय गंगे-

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  2. आपकी उत्कृष्ट प्रस्तुति मंगलवारीय चर्चा मंच पर ।।

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  3. भगवद गाथा संत सुनाते
    अद्भुत साधुजन आते हैं,
    नव इतिहास गढ़ा जाता है
    मिल कर सारे कुम्भ नहाते !

    बहुत ही सुन्दर चित्रांकन कुम्भ का
    सादर !

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  4. कविता में महाकुम्भ के बारे में इतनी जानकारी ....................वाह .........

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    1. कुंवर कुसुमेश जी, स्वागत व आभार !

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  5. बहुत उम्दा प्रस्तुति आभार

    आज की मेरी नई रचना आपके विचारो के इंतजार में
    अर्ज सुनिये

    आप मेरे भी ब्लॉग का अनुसरण करे

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  6. महाकुम्भ का महाकाव्य लिखा है ...
    उम्दा प्रस्तुति ...

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  7. गागर में सागर भर दिया अनीता जी आपने तो ,
    अपने आप में अजूबा ही है विश्व में कुम्भ-मेला
    अद्भुत-रचना.....सुंदर........
    साभार......










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  8. कुम्भ का सुंदर और विस्तृत वर्णन .....वाह
    मेरा ब्लॉग आपके स्वागत के इंतज़ार में
    स्याही के बूटे

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  9. सचमुच ही यह विश्व का सबसे बड़ा और सबसे अनुपम मेला है !

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    1. प्रतिभा जी, आपने सही कहा है

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