सोमवार, नवंबर 19

पारिजात क्यों झर जाते हैं






फूलों, रंगों, झरनों वाले, क्यों भाते हैं गीत
तू बसता है इनमें स्वयं ही, तू जो सबका मीत !


कुहू कुहू कूजन वूजन
सब तुझसे ही घटती है,
एक लोक है इससे सुंदर
सदा वहीं से आती है !

यह हल्की सी छुवन है तेरी
पत्तों की सरसर भी तुझसे,
शरद काल का नीला अम्बर
कहता तेरी गाथा मुझसे !

हरी कोंपलों पर किरणों की
 चमक रूप नए धरती है,
स्वर्णिम तेरा रूप अनोखा
छवि कैसी पुलक भरती है !

केसरिया, श्वेत तन वाले
पारिजात क्यों झर जाते हैं,
तेरे सुरभि कोष से लेकर
कतरे चंद बिखर जाते हैं !

धूप-छाँव का खेल अनोखा
दिवस-रात्रि का मेला अद्भुत,
तूने सहज रचा है प्रियतम
तू ही बदली तू ही विद्युत !  

9 टिप्‍पणियां:

  1. वाह क्या कहने अनिता जी ...

    सुन्दर प्रस्तुती :)

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  2. सब उस प्रियतम का ही रचा खेल है .... सुंदर भाव

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  3. वाह..
    केसरिया, श्वेत तन वाले
    पारिजात क्यों झर जाते हैं,
    तेरे सुरभि कोष से लेकर
    कतरे चंद बिखर जाते हैं !
    बहुत सुन्दर अनिता जी...

    सादर
    अनु

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  4. रोहितास जी, संगीता जी, वन्दना जी व अनु जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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  5. तू बसता है इनमें स्वयं ही, तू जो सबका मीत.......बेहतरीन और शानदार।

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  6. फूलों, रंगों, झरनों वाले, क्यों भाते हैं गीत
    तू बसता है इनमें स्वयं ही, तू जो सबका मीत !
    सुन्दरम मनोहरं .काव्य सौन्दर्य देखते ही बनता है पूरी रचना में .

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