शनिवार, फ़रवरी 8

बहने दो

बहने दो


बहने दो पावन रसधार, मत रोको !
झरने दो नयनों से अश्रुधार, मत टोको

माना मन का परिचय है बंधन से
डरता है अनहद की गुंजन से

खिलने दो अन्तस् की डार, मत रोको !
भरने दो भीतर फागुनी बयार, मत टोको !

माना मन स्वप्नों में खोया है
अनजाने रस्तों पर रोया है

छाने दो प्रियतम का प्यार, मत रोको !
खुलने दो अंतर का द्वार, मत टोको !

सुनने दो कानों को कुदरत की भाषा
गिर जाये जन्मों से बाँध रही आशा

कुछ भी न रहने दो, मत रोको !
जीवन को कहने दो, मत टोको !




13 टिप्‍पणियां:

  1. ....खुले हृदय के द्वार ॥
    और चले फाल्गुनी बयार ...
    बहुत सुंदर रचना ...!!

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  2. जीवन बहुत कुछ कहना चाहती है जिसे अंतर मन से सुनना जरुरी है
    बांधने की बजाय मुक्त होना जरुरी है
    सादर !

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  3. बहुत ही सुन्दर भावपूर्ण.

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  4. जीवन को कहने दो, मत टोको ! bahut sunder......

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  5. बहने दो पावन रसधार, मत रोको !
    झरने दो नयनों से अश्रुधार, मत टोको

    माना मन का परिचय है बंधन से
    डरता है अनहद की गुंजन से

    खिलने दो अन्तस् की डार, मत रोको !
    भरने दो भीतर फागुनी बयार, मत टोको !

    माना मन स्वप्नों में खोया है
    अनजाने रस्तों पर रोया है

    छाने दो प्रियतम का प्यार, मत रोको !
    खुलने दो अंतर का द्वार, मत टोको !

    सुनने दो कानों को कुदरत की भाषा
    गिर जाये जन्मों से बाँध रही आशा

    कुछ भी न रहने दो, मत रोको !
    जीवन को कहने दो, मत टोको !

    झरने सा सहज प्रवाह लिए है यह रचना प्रेम की रसधार और नेह निमंत्रण भी। आभार आपकी निरंतर टिप्पणियों का।

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  6. सुन्दर वेगवती निर्झर सी बहती जाती कलकल रचना

    बहने दो पावन रसधार, मत रोको !
    झरने दो नयनों से अश्रुधार, मत टोको

    माना मन का परिचय है बंधन से
    डरता है अनहद की गुंजन से

    खिलने दो अन्तस् की डार, मत रोको !
    भरने दो भीतर फागुनी बयार, मत टोको !

    माना मन स्वप्नों में खोया है
    अनजाने रस्तों पर रोया है

    छाने दो प्रियतम का प्यार, मत रोको !
    खुलने दो अंतर का द्वार, मत टोको !

    सुनने दो कानों को कुदरत की भाषा
    गिर जाये जन्मों से बाँध रही आशा

    कुछ भी न रहने दो, मत रोको !
    जीवन को कहने दो, मत टोको

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  7. अनुपमा जी, शिवनाथ जी, माहेश्वरी जी, वीरू भाई, अमृता जी, सुषमा जी, ललित जी, मृदुला जी, ओंकार जी, राकेश जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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  8. वाह ! कहीं थम न जाये टोकने से ..... बहने दो ...

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