सोमवार, फ़रवरी 3

झर जाये हर चाह तो

झर जाये हर चाह तो


थम कर ठिठक जाता है
खाली हुआ मन !
रीझ-रीझ जाता है खुद पर ही
तकने लगता है निर्निमेष अंतहीन
निज साम्राज्य को....
मौन एक पसरा है
राग बज रहा हो फिर भी कोई जैसे
सन्नाटा गहन चहूँ ओर
धुन गूंज रही हो कोई जैसे
नजर न आता दूर तक
पर साथ चल रहा हो कोई
पर होता है हर कदम अहसास
दृष्टि हटते ही बाहर से
भीतर अनंत नजर आता है
नहीं दीवारें न कोई रास्ता
अंतहीन एक अस्तित्त्व
ढक लेता है रग-रग को
भर देता है तृप्ति भीतर
झरना ऐसा झरता है
हर लेता जो तृषा जन्मों की
जहाँ किया नहीं जाता कुछ भी
सब कुछ अपने आप घटता है
गूंजता है मानो कोई दिव्य आलाप
झर जाती है हर चाह
मन से जिस क्षण..

6 टिप्‍पणियां:

  1. दिव्य अनुभूति देते हुए अद्भुत शब्द एवं भाव भी ....!!बहुत सुंदर रचना अनीता जी ...!!

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  2. झर जाती है हर चाह
    मन से जिस क्षण..

    ...........Sunder Panktiya Anjta ji

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  3. बहुत खूब , बेहद सुंदर रचना ! बधाई

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  4. भौतिक जगत से दूर खींच ले जाती है कविता -कवि के मनोजगत का आभास देती-सी !

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  5. अनुपमा जी, संजय जी, सतीश जी और प्रतिभा जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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  6. झर जाती है हर चाह ..... बहुत ही सुन्दर |

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