मंगलवार, अक्तूबर 28

पंछी उड़ जायेगा इक दिन


पंछी उड़ जायेगा इक दिन



कौन रुकेगा यहाँ व कब तक
देर नहीं, टूटेगा पिंजरा,
पंछी उड़ जायेगा इक दिन
कभी न देखा जिसका चेहरा !

उस पंछी को मीत बना ले
वही अमरता को पाता है,
लहर मिटी सागर न मिटता
जीवन सदा बहा करता है !

उससे जिसने लगन लगाई
ठहरा जो पल भर भी उसमें,
अमृत पाया अपने भीतर
मिटा बीज जीया अंकुर में !

खो जायेगा इक पल सब कुछ
अंधकार ही सन्मुख होगा,
बना साक्षी मुस्काता जो  
तब भी कोई शेष रहेगा !

खुद से पार खड़ा जो हर पल
उससे ही पहचान बना लें,
तृषा जगे उससे मिलने की
प्रीति बेल सरसे जीवन में !



14 टिप्‍पणियां:

  1. दिल से लिखी गयी है ..और दिल तक पहुची भी

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  2. खुद से परे होकर उसे पहचानना ही तो सारतत्त्व है पर वही सबसे मुश्किल भी है ।

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  3. कल 30/अक्तूबर/2014 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद !

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  4. एक शाश्वत सत्य की बहुत प्रभावी अभिव्यक्ति....

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  5. मुश्किल को आसान बनाना ही तो साधना है..

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  6. मुझे तो लगता है असली कसौटी इस दुनिया में रहना है -फिर क्या पता ,सब सुनी-सुनाई बातें .कोई कुच कहता है कोई कुछ .आपकी अभिव्यक्ति बहुत अच्छी है.

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  7. कैलाश जी व परी जी , स्वागत व आभार !

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  8. प्रतिभा जी, कबीर कहते हैं सुनी सुनाई बात नहीं, यह आंखन देखि बात है...ध्यान ही वह आंख है जहाँ सत्य प्रकटता है...

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  9. एक सत्य जिसकी प्राप्ति ही जीवन का सार है ...

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