शनिवार, फ़रवरी 28

कोंपल कोंपल रस झरता


कोंपल कोंपल रस झरता

मदमस्त हुआ आलम सारा
आया वसंत नव कुसुम खिले ,
उमड़ी आती मधुमय सुरभि
पौधों के सोये कोष खुले !

खलिहानों पर छायी मस्ती
शुभ पीताम्बर ओढ़े हँसते,
जल धाराएँ बह निकलीं हैं
हटा शीत की चादर तन से !

तंद्र तज जागे वन प्रान्तर
जीवन से फिर हुआ मिलन,
छूट गया अवांछित था जो
जाग उठा कोई नव रंग !

जाना पहचाना सा प्रियतम
आया मनहर रूप धरे,
बासंती जब पवन बहे तो
सूने अंतर भये हरे !

जीवन फिर अंगड़ाई लेता
नव रूप लिये हँसता खिलता,
ऋतु फागुनी मादक मोहक
कोंपल कोंपल रस झरता !



6 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुन्दर !!

    सादर
    अनुलता

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  2. जीवन फिर अंगड़ाई लेता
    नव रूप लिये हँसता खिलता,
    ऋतु फागुनी मादक मोहक
    कोंपल कोंपल रस झरता !

    ........दिल को छूते अलफ़ाज़

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  3. अहा ... रस से सराबोर कर गयी आपकी यह रस भरी कविता !

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  4. अनुजी, संजय जी व शालिनी जी स्वागत व आभार !

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  5. एक स्फूर्ति जाग्रत करती बहुत सुन्दर रचना...आभार

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  6. स्वागत व आभार कैलाश जी !

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