आह्वान
चलो सँवारें गाँव देश को
सूखे पत्ते जरा बुहारें
भूलों के जो बने खंडहर
उन्हें गिराकर
या भावी की आशंकाएँ
जो घास-फूस सी उग आयी हैं
उन्हें हटाकर
सूरज को फिर दे आमन्त्रण
वर्तमान के इस शुभ पल में
फूल खिला दें
ग्राम्य देवता धीरे से आ
कर कमलों से उन्हें हिला दें
सुखद स्मृति कोई पावन
बहे यहाँ फिर शुभ यमुना बन
तट पर जिसके बजे बाँसुरी
हँसे कन्हैया का वृंदावन
चलो पुकारें, दे आमन्त्रण
हर शुभता को
उगे हुए झंखाड़ उखाड़ें
आशंका की यदि बदलियां
छायीं मन पर
बह जाने दें झरते जल को
भीग उठे श्यामल धरती का
हर इक रज कण !




