बुधवार, अक्तूबर 7

हम तो घर में रहते हैं


हम तो घर में रहते हैं

जग की बहुत देख ली हलचल
कहीं न पहुँचे कहते हैं,
पाया है विश्राम कहे मन
हम तो घर में रहते हैं !

जिसके पीछे दौड़ रहा था
छाया ही थी एक छलावा,
घर जाकर यह राज खुला
माया है जग एक भुलावा !

कदम थमे तब दरस हुआ
प्रीत के अश्रु बहते हैं,
रूप के पीछे छिपा अरूप
उससे मिलकर रहते हैं !

8 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी लिखी रचना "पांच लिंकों का आनन्द में" शुक्रवार 09 अक्टूबर 2015 को लिंक की जाएगी............... http://halchalwith5links.blogspot.in पर आप भी आइएगा ....धन्यवाद!

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  2. आपकी इस प्रस्तुति का लिंक 08 - 10 - 2015 को चर्चा मंच पर

    चर्चा - 2123
    में दिया जाएगा
    धन्यवाद

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  3. सुन्दर शब्द रचना ........... आभार
    http://savanxxx.blogspot.in

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  4. जिसके पीछे दौड़ रहा था
    छाया ही थी एक छलावा,
    घर जाकर यह राज खुला
    माया है जग एक भुलावा !
    ...एक शाश्वत सत्य जिसे समझने में एक उम्र गुज़र जाती है...बहुत सुन्दर

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  5. यशोदा जी, सावन जी, कैलाश जी, प्रतिभा जी व अमृता जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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