गुरुवार, अप्रैल 21

अर्थवान मन

अर्थवान मन

समेट ले सारे ब्रह्मांड को अपने भीतर
या ‘न कुछ’ हो जाये
मन तभी अर्थवान होता है
वरना तो बस परेशान होता है
कभी इस बात से चिढ़ता कभी
उस बात से हैरान होता है
कल्पनाशील है सो दुःस्वप्न जगाता है
चिंता के झाड़ खड़े कर इर्दगिर्द
स्वयं को उनसे घिरा पाता है
लड़ता कभी औरों को लड़वाता है
जो बन सकता था फुहार शांति की
तपकर खाक हुआ जाता है
प्रीत का जो झरना भीतर कैद है
बनकर चट्टान उसके मुहाने पर बैठ जाता है
जुड़ा ही था जो अस्तित्त्व से सदा
उसे तोड़कर स्वयं को ही घायल बनाता है
कौन समझाये उसे जो ज्ञान की खान है खुद ही
पर नजरें सदा औरों पर गड़ाता है
सिमट आये अनंत जिसके आंचल में
वह एक कतरे के लिए आँसू बहाता है ! 

3 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर व सार्थक रचना प्रस्तुतिकरण के लिए आभार!

    मेरे ब्लॉग की नई पोस्ट पर आपका स्वागत है...

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  2. ओंकार जी व जीवन जी, स्वागत व आभार

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