मंगलवार, अप्रैल 5

प्रकाश की एक धारा


प्रकाश की एक धारा

प्रकाश की एक धारा
अनवरत साथ बहती है
भले नजर न आये सरस्वती सी
गहराई की थाह नहीं जिसकी
और शीतल इतनी कि गोद में उसकी
अग्नि भी विश्राम पाती है !
उठती लहरें अन्तरिक्ष तक ऊंची
छलक जातीं बूंदें जहाँ-जहाँ
बन जाती वह भूमि यज्ञ शाला
आचमन करने वाला उर
तृप्त हो जाता
उसके सिवा कुछ भी जिसे
 छू भी नहीं पाता
पावन वह धारा
अजस्र भीतर रहती है !
प्रकाश की एक धारा
अनवरत साथ बहती है ! 

3 टिप्‍पणियां:

  1. प्रकृति को समेटलिया है आपने कविता में । बहुत सुंदर ।

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  2. स्वागत व आभार, ओंकार जी व मधुलिका जी !

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