बुधवार, अक्तूबर 19

जिंदगी का गीत यूँ ही

जिंदगी का गीत यूँ ही

सोचते ही आज बीता
कल कभी आता कहाँ,
जिंदगी का गीत यूँ ही
छिटक ही जाता रहा !

डर छुपाये जी रहा जग
धुधं, कोहरा या धुआं सा,
मांगता रब से दुआएं
कंप रहा मन पात सा !

नींद में जो स्वप्न देखे
जागते ही खो गये वे,
जग उठे भीतर उजाला
स्वप्नवत होगा जगत ये !

मुस्कुराती जिन्दगी तब 
बाँह फैलाये मिलेगी,
हर कदम पर खिलखिलाती 
गंग धारा सी बहेगी !

11 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. स्वागत व आभार संध्या जी व ओंकार जी !

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  2. पल पल समय हाथ से छिटक हाई रहा है ... पर शायद यही तो जीवन भी है ...

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    1. शायद यही जीवन है.. शायद इसके पार भी कुछ है..एक महाजीवन...जिसकी हमें खबर ही नहीं है..

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  3. स्वागत व आभार संजय जी !

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