शुक्रवार, फ़रवरी 24

कभी पवन का झोंका कोई




कभी पवन का झोंका कोई


नीरव दोपहरी में छन-छन
किरणें वृक्ष तले सज जातीं,
कभी हवा के झोंके संग इक
लहराती पत्ती बिछ जाती !

मधु संचित करते कुसुमों से
भंवरे, तितली अपनी धुन में,
श्वेत श्याम कबूतर जब तब
जाने क्या चुगते बगिया में !

कभी पवन का झोंका कोई
बिखरा जाता पाटल पल्लव,
मुंदने लगती आँख अलस भर
भर जाता प्राणों में सौरव  !

 कलरव करते खगअविकल
जाने क्या कहते गाते हैं,
सृष्टि कितने भेद छुपाये
देख-देख लब मुस्काते हैं !

नील वितान तना है ऊपर
प्रहरी सा निर्भय करता है,
धरा समेटे निज अंक में
जीवन यूँ पल-पल खिलता है ! 

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