शुक्रवार, सितंबर 1

अनकहे गीत बड़े प्यारे हैं

अनकहे गीत बड़े प्यारे हैं

जो न छंद बद्ध हुए
बिल्कुल कुंआरे हैं
तिरते अभी गगन में  
गीत बड़े प्यारे हैं !

जो न अभी हुए मुखर
अर्थ कौन धारे हैं
ले चलें जाने किधर
पार नद उतारे हैं !

पानियों में संवरें
पी रहे गंध माटी
जी रहे ताप सहते
मौन रूप धारे हैं !

गीत गाँव व्यथा कहें 
भूली सी कथा कहें 
गूंजते, गुनगुनाते
अंतर संवारे हैं !

गीत जो हृदय छू लें
पल में उर पीर कहें
ले चलें अपने परों 
दूर से पुकारें हैं !


8 टिप्‍पणियां:

  1. आपके गीतों में ग्राम्य जीवन का सुन्दर दर्शन समाया हुआ रहता है। इन गीतों की अनुभूतियां निश्चय ही आज की प्रतीत नहीं होतीं। ये पुरातन सुन्दर ग्रामीण जीवन के साहित्य का अत्यंत सुखद वर्णन है।

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    1. सुंदर शब्दों में कविता की प्रशंसा करने के लिए आभार विकेश जी

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  2. हृदय को छूती बहुत‎ खूबसूरत रचना‎ ।

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  3. बहुत सुन्दर‎ ,मनमोहक गीत.

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  4. बहुत सुन्दर और मनमोहक रचना‎ ।

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    1. इतनी सारी सकारात्मक प्रतिक्रियाओं के लिए आभार मीना जी

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  5. बहुत सुन्दर गीत ... सीधा सरल, मन, उमंगें और सकारात्मकता लिए ...सोंधी खुशबू लिए ...

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    1. सुस्वागतम व आभार दिगम्बर जी !

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