मंगलवार, मार्च 12

बिखरा दूँ, फिर मुस्का लूँ



बिखरा दूँफिर मुस्का लूँ 


खाली कर दूँ अपना दामन
जग को सब कुछ दे डालूँ, 
प्रीत ह्रदय की, गीत प्रणय के
बिखरा दूँ, फिर मुस्का लूँ !

तन की दीवारों के पीछे
मन मंदिर की गहन गुफा,
जगमग दीप उजाला जग में
फैला दूँ, फिर मुस्का लूँ !

अंतर्मन की गहराई में
सुर अनुपम नाद गूंजता,
चुन-चुन कर मधु गुंजन जग में
गुंजा दूँ, फिर मुस्का लूँ !

भीतर बहते मधुमय नद जो 
प्याले भर-भर उर पाता,
अमियसरिस रस धार जगत में
लहरा दूँ, फिर मुस्का लूँ !

हुआ सुवासित तन-मन जिससे
 भरे खजाने हैं भीतर
सुरभि सुगन्धित पावन सुखमय
छितरा दूँ, फिर मुस्का लूँ !


10 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन केन्द्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल को शुभकामनायें : ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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  2. सब कुछ दे देने के बाद जो प्रापर होता है उसकी अभिव्यक्ति शायद संभव न हो ...
    स्वयं को हों करना काश आसान हो जाये ... भावपूर्ण सुन्दर रचना ...

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  3. सच में देने में जो सुख है उतना प्राप्त करने में नहीं...बहुत सारगर्भित रचना..

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