सोमवार, जुलाई 6

बेखुदी में आँख मूँदे हम सदा ही

बेखुदी में आँख मूँदे हम सदा ही 

हर कदम पर कौन हमसे पूछता है 
श्रेय का या प्रेय का तुम मार्ग लोगे, 
बेखुदी में आँख मूँदे हम सदा ही 
प्रेय के पथ पर कदम रखते रहे हैं !

चन्द कदमों तक हैं राहें अति कोमल 
फूल खिलते और निर्झर भी बिखरते, 
किन्तु आगे राह टेढ़ी है कँटीली 
दिल हुए आहत जहाँ रोते रहे हैं !

फिर कहीं से इक जरा आवाज आती 
प्रेय का तज श्रेय का हम मार्ग लेते, 
झेलते दुश्वारियां थोड़ी शुरू  में 
चैन की फिर नींद हम सोते रहे हैं !

सत्य का पथ, प्रेम का पथ श्रेय का है 
आज दिल पर हाथ रखकर यह शपथ लें, 
प्रेय जो लगता नयन को छल निकलता 
पथ वही शुभ श्रेय ही जिसमें छुपा है !

6 टिप्‍पणियां:

  1. उत्तर
    1. स्वागत ! शुक्रिया बताने के लिए, मुझे ज्ञात नहीं था.

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  2. आपकी इस प्रविष्टि् की चर्चा कल बुधवार (08-07-2020) को     "सयानी सियासत"     (चर्चा अंक-3756)     पर भी होगी। 
    --
    हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।  
    सादर...! 
    डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'  
    --

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  3. प्रेम का पथ सदा उत्तम रास्ता है ... इश्वर का रास्ता यही है ... सत्य इसी रास्ते मिलता है ...
    सुन्दर भावपूर्ण रचना ...

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