राह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
राह लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

रविवार, जनवरी 19

नये साल की एक भोर

नये साल की एक भोर 


वादा किया था उस दिन

एक नयी भोर का  

लो !  आज ही वह भोर 

मुस्कुराती हुई आ गई है 

गगन लाल है पावन बेला 

सितारों ने ले ली है विदा 

दूर तक फैला है उजियाला 

नयी राहों पर कदम बढ़ाओ 

आँख खोली है पंछियों और कलियों ने 

संग हवाओं के तुम भी तो कुछ गुनगुनाओ 

पोंछ डालो हर कालिमा बीती रात की 

नये जोश से नये साल में कदम रखो 

ख़ुद के होने पर गर्व करो 

अपनी हस्ती को जरा और फैलाओ !


गुरुवार, अक्टूबर 17

हकीकत



हकीकत 


"हर रात सपनों से भरी थी 

दिवस कोई ख़ाली कहाँ था 

कहाँ पाते ओ ! रब तुझे हम 

बंद जग का हर इक मकाँ था" 



जाना कहाँ था, पहुँचे कहाँ हैं 

दाता का दर सदा ही खुला है 


 भटके थे राह अब चेत आया 

क्या वह मिलेगा जो था गँवाया 


भूले हुए जब घर लौट आते 

कहते हैं, फिर न भूले कहाते 


माँ देखे पथ पिता बाट तकते 

जल्दी जरा ठिकाने को लौटें 


अब भी समय है इसे न गँवायें 

अपनी हकीकत जानें, जतायें 


बुधवार, फ़रवरी 22

किंतु न जानूँ पथ पनघट का


किंतु न जानूँ पथ पनघट का

पंथ निहारा, राह बुहारी 

लेकिन तुम आए नहीं श्याम, 

नयन बिछाए की प्रतीक्षा 

बीत गए कई आठों याम !


अंतर में संसार भरा था 

शायद तुम एकांत  निवासी, 

कहाँ बिठाती इस दुविधा से 

बचा गए मुझको घनश्याम !


अब यह सूनापन भाता है 

हर आहट पर हृदय धड़कता, 

एक नज़र ही पा जाए मन 

नहीं औरों से मुझको काम !


नगरी तेरी दूर  नहीं है 

किंतु न जानूँ पथ पनघट का, 

जीवन की संध्या  घिर आयी 

कब दर्शन  मिले  मनोभिराम !


शनिवार, जनवरी 7

प्रेम स्वप्न बन कर पलता है



प्रेम स्वप्न बन कर पलता है

एक बार फिर देखें मुड़कर

कितनी राह चले आये हम,

कब थामा था हाथ हाथ में 

कितनी चाह भरे भीतर मन !


छोटा सा संसार  बसाया

कितने ही परिवर्तन देखे,

कितने सफर, मंजिलें कितनी

कितने ही अभिनन्दन देखे !


बरसों का है साथ अनोखा

लगे आज भी नया-नया सा,

है अनंत जीवन यह अद्भुत 

राज न कोई जाने जिसका !


अभी सफर यह शुरू हुआ है 

अब तलक भूमिका ही बाँधी ,

जीवन नित नव द्वार खोलता

व्यर्थ यहाँ सीमा बाँधी थी !


पाया ही पाया है अब तक 

प्रीत लुटाने की रुत आयी,

जगी ऊर्जा सुप्त पड़ी, कुछ 

कर दिखलाने की रुत आयी !


हर पल कोई साया बनकर 

सदा साथ ही जो चलता है,

प्रेम हमारा अनुपम रक्षक

प्रेम स्वप्न बन कर पलता है !


उन सभी को समर्पित जिनके विवाह की वर्षगाँठ इस वर्ष है


रविवार, अक्टूबर 24

जब उर अंधकार खलता है

जब उर अंधकार खलता है 


जगमग शिखि समान तब कोई 

सुहृद सहज आकर मिलता है 


 पूर्ण हुआ वह राह दिखाता

नहीं अधूरापन टिकता है 


अविरल बहे काव्य की धारा 

उर मरुथल बन क्यों रहता है 


थिर पाहन सा जब हो मानस 

निर्झर तब उससे बहता है 


प्रीत अगन उसको पिघला दे 

मन जो सघन विरह सहता है 


सोमवार, दिसंबर 7

जो घर खाली दिख जाता है


जो घर खाली दिख जाता है 
एक-एक कर चुन डाले हैं 
राह के सारे पत्थर उसने, 
कंटक चुन-चुन फूल उगाये 
हरियाली दी पथ पर उसने ! 

ऊपर-ऊपर यूँ लगता है 
पर भीतर यह राज छिपा है, 
वह खुद ही आने वाला है 
उस हेतु यह जतन किया है ! 

जिस दिल को चुनता घर अपना 
उसे संवारे सदा प्रेम से, 
जो घर खाली दिख जाता है 
डेरा डाले वहीं प्रेम से ! 

उसकी है हर रीत निराली  
बड़ा अनोखा वह प्रियतम है, 
एक नयन में देता आँसू 
दूजे में भरता शबनम है ! 

वह जो है बस वह ही जाने 
हम तो दूर खड़े तकते हैं, 
वही पुलक भरता अंगों में 
होकर भी हम न होते हैं ! 
 

बुधवार, नवंबर 11

कुछ ख्याल


कुछ ख्याल 


 हजार राहे हैं जिनसे गुजर के तू मिलता है 
किसी बाग में कमल कभी गुलाब बना खिलता है 

हरेक मुट्ठी में कैद है एक आसमां अपना 
जब जो ख्वाहिश करेगा चाँद उस पल निकलता है 

एक रस्ता पकड़ ले और चलता चले उसी पर 
क्यों निगाहों को बिखेरे दिलेदर्द पिघलता है 

हजार नदियां गुजर कर जहाँ भी पहुँचें
समंदर एक ही हरेक को मिलता है 

क्यों कशमकश में दिनों तक लम्हे गुजरते हैं 
वक्त के पार ही वह जांनिसार मिलता है 

थम जाये मन की दौड़ जिस पल किसी की कहीं
खुले वह द्वार जो उसके दर पे निकलता है 

गौर से देखा है कभी मन को समझा भी 
इन्हीं के पानियों में उसका कमल खिलता है 

सोमवार, जुलाई 6

बेखुदी में आँख मूँदे हम सदा ही

बेखुदी में आँख मूँदे हम सदा ही 

हर कदम पर कौन हमसे पूछता है 
श्रेय का या प्रेय का तुम मार्ग लोगे, 
बेखुदी में आँख मूँदे हम सदा ही 
प्रेय के पथ पर कदम रखते रहे हैं !

चन्द कदमों तक हैं राहें अति कोमल 
फूल खिलते और निर्झर भी बिखरते, 
किन्तु आगे राह टेढ़ी है कँटीली 
दिल हुए आहत जहाँ रोते रहे हैं !

फिर कहीं से इक जरा आवाज आती 
प्रेय का तज श्रेय का हम मार्ग लेते, 
झेलते दुश्वारियां थोड़ी शुरू  में 
चैन की फिर नींद हम सोते रहे हैं !

सत्य का पथ, प्रेम का पथ श्रेय का है 
आज दिल पर हाथ रखकर यह शपथ लें, 
प्रेय जो लगता नयन को छल निकलता 
पथ वही शुभ श्रेय ही जिसमें छुपा है !

शुक्रवार, अप्रैल 17

इक राह नई चुननी है

इक राह नई चुननी है 


इक राह नई चुननी है 
रक्षित दुर्ग बनाना है, 
इस अनजाने दुश्मन से
सबको ही बचाना है !

धीरज की बाँह पकड़कर 
सहना है हर अनुशासन ,
मन ना कोई विचलित हो
 शुभ संदेश सुनाना है !

थोड़े में गुजारा हो 
मिल बांट के हम खाएँ,
कोई भी अकेला हो 
उसे ढूंढ के लाना है !

मीलों की भले दूरी 
दिल से नहीं दूर रहें, 
करुणा जगे अंतर में 
यही फूल खिलाना है !

बुधवार, नवंबर 6

भोर के तारे सा छुप जाएगा जग


भोर के तारे सा छुप जाएगा जग 



बंद आँखों से जमाना देखते हैं हम कहाँ अक्सर हकीकत देखते हैं चाह की चादर ओढ़ायी थी किसी ने यूँही अपना हक समझ कर देखते हैं दोनों हाथों से जकड़ चलते रहे दिल को ही बढ़कर खुदा से देखते हैं जिस राह पर दुश्वारियां मंजिल नहीं ख़्वाब उस के ही दिलों में देखते हैं भोर के तारे सा छुप जाएगा जग पत्थरों में निशां उसके देखते हैं जो सुकूं का, है समंदर प्रीत का भी उसे सदियों दूर से ही देखते हैं आसमां है बदलियां, बारिशें, धूप जो जरूरी जुड़ उसी से देखते हैं

शनिवार, फ़रवरी 23

एक जागरण ऐसा भी हो



एक जागरण ऐसा भी हो


पल में गोचर हो अनंत यह
इक दृष्टिकोण ऐसा भी हो,
जिसकी कोई रात न आये
एक जागरण ऐसा भी हो !

कुदरत निशदिन जाग रही है
अंधकार में बीज पनपते,
गहन भूमि के अंतर में ही
घिसते पत्थर हीरे बनते !

राह मिलेगी उसी कसक से
होश जगाने जो आती है,
धूप घनी, कंटक पथ में जब
एक ऊर्जा जग जाती है !

प्रीत चाहता उर यदि स्वयं तो

अप्रीति के करे न साधन,
मंजिल की हो चाह हृदय में
अम्बर में उड़ने से विकर्षण ?


डोर बँधी पंछी पग में जब
कितनी दूर उड़ान भरेगा,
सुख स्वप्नों में खोया अंतर
दुःख की पीड़ा जाग सहेगा !





शनिवार, जुलाई 7

चाह जो उस की जगी तो



चाह जो उस की जगी तो



राह कितनी भी कठिन हो
दूब सी श्यामल बनेगी,
चाह जो उस की जगी तो
उर कली इक दिन खिलेगी !

जल रहा हर कण धरा का
अनुतप्त हैं रवि रश्मियाँ,
एक शीतल परस कोमल
ताप हरता हर पुहुप का  !

लख नहीं पाते नयन जो
किन्तु जो सब देखता है,
जगी बिसरी याद जिसमें
मन वही बस चेतता है !

व्यर्थ न कण भर भी जग में
अर्थ उसमें कौन भरता,
नयन रोते, अधर हँसते
राज जब खुल रहा लगता !

एक कोमल छांव पल-पल
श्वास में आलोक भरती,
बांह थामे आस्था इक
हर कदम पर साथ देती !

शुक्रवार, जनवरी 12

कदमों में भी राहें हैं



कदमों में भी राहें हैं

अभी जुम्बिश भुजाओं में
कदगों में भी राहें हैं,
अभी है हौसला दिल में
गंतव्य पर निगाहें हैं !

परम  दिन-रात रचता है
जगती नित नूतन सजती,
नींदों में सपन भेजे
जागरण में धुनें बजतीं !

चलें, हम थाम लें दामन
इसी पल को अमर कर लें,
छुपा है गर्भ में जिसके
उसे देखें, नजर भर लें !

अभी झरने दें शब्दों को
प्रस्तर क्यों बनें पथ में,
सृजन का स्रोत है अविचल
बहाने दें सहज जग में !

अभी मुखरित तराने हों
विरह के भी प्रणय के भी,
किसी के अश्रु थम जाएँ
वेदना  से विजय के भी !

नहीं रुकना नहीं थमना
अभी तो दूर जाना है,
जिसे अपना बनाया है
उसे जग में लुटाना है !


बुधवार, दिसंबर 7

राह देखता कोई भीतर


राह देखता कोई भीतर 

बाहर धूप घनी हो कितनी 
घर में शीतल छाँव घनेरी,
ऊबड़-खाबड़ पथरीला मग
दे आमन्त्रण सदा वही  !

लहरें तट से टकरा घायल 
घर जा पुनः ऊर्जित होतीं,
मन लहरों सा सदा डोलता 
घर जाने की सुध न आती !

राह देखता कोई भीतर 
मीलों विस्तृत नीलगगन सा,
क्लांत बटोही पा जाये ज्यों 
चिर आश्रय सुखद बसेरा !

किंतु स्वप्न में खोया अंतर 
घर से दूर निकल आया है,
भूल-भुलैया में जगती की 
स्वयं ही स्वयं को भटकाया है !










शुक्रवार, जून 12

राहे जिंदगी में

राहे जिंदगी में

न तू है न मैं बस एक ख़ामोशी है
इश्क की राह पर यह कैसा मोड़ आया

न ख्वाहिश मिलन की न विरह का दंश
राहे जिंदगी में कैसा मुकाम आया

एक ठहराव सा कोई सन्नाटा पावन
सफर में यह अनोखा इंतजाम पाया

पत्ते-पत्ते पर लिखी है कहानी जिसकी
हर श्वास पर उसी का अधिकार पाया 

बुधवार, मई 20

गाँठ सभी खोल लो


गाँठ सभी खोल लो
  

एक वर्ष और बीता
गठरी न बांधो और
जाने कब चलना हो
अंतिम हो कौन भोर ?

हल्का ही मन रहे
सफर जाने कैसा हो,
गाँठ सभी खोल लो
कौड़ी न पैसा हो !

एक ही लगन रहे
जाना है उसी देश,
कोई जहाँ तके राह
भटके बहुत परदेश !

गुरुवार, जनवरी 29

बन बसंत जो साथ सदा हो

बन बसंत जो साथ सदा हो



किसकी राह तके जाता मन
खोल द्वार दरवाजे बैठा
किसकी आस किये जाता मन !

एक पाहुना आया था कल
एक हँसी भीतर जागी थी,
हुई लुप्त फिर घट सूना है
फिर से इक मन्नत माँगी थी !

किसकी बाट जोहता हर पल 
किसकी याद संजोये बैठा
किसकी चाह किये जाता मन !

मिला बहुत पर नहीं वह मिला
बन बसंत जो साथ सदा हो,
स्वप्न नहीं बहलाते, ढूढें  
तृप्ति का जो मधुर राग हो !

किसको यह आवाज लगाये
किसकी आहट को तरसे
किसकी प्यास भरे जाता मन !