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शनिवार, मई 23

तेरा-मेरा भेद हुआ कब

तेरा-मेरा भेद हुआ कब 


तू सिंधु, मैं बूँद हूँ तेरी 

तू सूरज मैं किरण सुनहरी, 

तू संपूर्ण समष्टि, मैं व्यष्टि 

तू बोध विशुद्ध हूँ मैं दृष्टि ! 


तू व्यापक, मैं तेरा वंश

 शांति अनंत, प्रेम का अंश,

तेरी ही धुन मुझमें बजती  

चहूँ पहर है तेरी मस्ती !


यह जग तेरी ही माया है 

अहंकार तेरी छाया है, 

जान लिया रहस्य यह जिस ने 

 सरस संग निशदिन पाया है ! 


तुझ संग उठता और बैठता 

तुझ संग जगता व सोता है, 

सारा जग जब पाया भीतर 

बाहर क्या उसका खोता है !


भीतर ही तो तू मिलता है 

कण-कण, पोर-पोर खिलता है 

अब न कोई दूरी कहीं  है 

इक दूजे में ही बसता है !

 

सोमवार, जनवरी 8

बूँद एक घर से निकली थी

बूँद एक घर से निकली थी 


अंधकार में ठोकर खाते 

आँखें बंद किए चलते हैं, 

जाने कौन  मोह में फँस कर 

अक्सर ख़ुद को ही छलते हैं !


छोटी-छोटी इच्छाओं के 

बोझे तले व्यर्थ दबते हैं, 

सिर पर गठ्ठर लादे, जाने

कब से बीहड़ पथ चलते हैं !


अनजाने ही रह जाते वह 

अपने दिल की गहराई से, 

जीवन की संध्या आ जाती 

कान भरे हैं शहनाई से !


सागर से मिल सकती थी जो 

मरुथल में दम तोड़ रही है, 

बूँद एक घर से निकली थी 

जाने क्या वह जोड़ रही है ! 


अपनी ही ऊँचाई से बच 

बौना होता जाता मानव, 

पहचाने जाते थे पहले 

अब सबके भीतर ही दानव ! 


दुख की ठोकर जब भी लगती 

जाग देखता है सोया मन, 

पीड़ा ही पथ पर रखती है 

सुख में तो भटका है जीवन !


पर्वत जैसा दुख भी आये 

सागर सुख का ठाँठे मारे, 

आँख मूँद कर चलते पथ में 

ज्योति निरंतर जलती द्वारे ! 


मंगलवार, अगस्त 2

छिपा बूँद में भी इक सागर

छिपा बूँद में भी इक सागर


छोटा सा दिल लघु सी चाहत 

उससे बनती मन की कारा, 

उठो आज अम्बर को छू लो 

है अनंत सामर्थ्य तुम्हारा !


​​शुभ विवेक, आनंद छुपा है 

अन्न, प्राण, मन में ही अटके 

अपने ही बल से अनजाने 

बार-बार इस भव में भटके 


एक अपार ऊर्जा अविरत 

फैली है जो भीतर-बाहर,

बनो माध्यम बहना चाहती  

छिपा बूँद में भी इक सागर !


शांति,प्रेम ये शब्द नहीं हैं 

मूर्त रूप में भीतर रहते, 

मनस की यह अपार ऊर्जा 

क्यों न बिखेरें सहज विहँसते !


जीवन इक अनमोल कोष है 

प्रतिभिज्ञा भर इसकी कर लें,

साथ लिए जाएँ जग से क्यों

तृप्त हुए खुद इसे लुटा दें !




बुधवार, जुलाई 5

थामता है हर घड़ी वह


थामता है हर घड़ी वह

बूँद बनकर जो मिला था
सिंधु सा वह बढ़ा आता,
रोशनी की इक किरण था
बन उजाला पथ दिखाता !

थामता है हर घड़ी वह
जो बरसता प्रीत बनकर,
खोल देता द्वार दिल के
फिर सरसता गीत बनकर !

हर नुकीली राह को भी
मृदु गोलाई में बदले,
कंटकों से जो भरी थी
मधु अमराई में बदले !

बस गया है आज दिल में
डाल डेरा और डंडा,
दूर से जो था पुकारे
मिल गया उसका ठिकाना !