मंगलवार, जुलाई 7

उसने अपनी याद जरा सी

उसने अपनी याद जरा सी 


जब नयनों में नींद नहीं थी 

उसका ही तो ख़्वाब बसा था, 

सुमधुर स्मृतियों के पत्तों से 

मन का आँगन पूर्ण भरा था !


अधरों पर मुस्कान सजीली 

ह्रदय की गहराई में तोष,

आश्वासन थपकी देता था 

लोरी गा रहा था संतोष !


फिर जाने कब निद्रा देवी 

पलकों पर आकर बैठी थी,   

उसने अपनी याद जरा सी 

शायद पीछे खिसका दी थी !


तन सोया ऊर्जा जगती थी 

कंपन सिहरन रह-रह होता, 

एक अखंड ज्योति जलती जब  

क्योंकर दर्श न उसका होता !


उसके पथ पर जो चलता है 

नित उपहार मिला करते हैं,

नींद, जागरण, स्वप्न सभी के 

जाकर पार मिला करते हैं !


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