वासन्ती प्रभात
जन्म और मृत्यु के मध्य
बाँध लेते हैं हम कुछ बंधन
जो खींचते हैं पुनः इस भू पर
भूमिपुत्र बनकर न जाने कितनी बार बंधे हैं
अब पंच तत्वों के घेरे से बाहर निकलना है
पहले निर्मल जल सा बहाना है मन को
फिर अग्नि में तपना है
होकर पवन के साथ एकाकार
घुल जाना है निरभ्र आकाश में
फिर आकाश से भी परे
उस परम आलोक में जगना है
जहां कभी दिन होता न रात
सदा ही रहता है वासन्ती प्रभात
जहाँ द्रष्टा और दर्शन में भेद नहीं
जहाँ दर्शन और दृश्य में अभेद है
आनंद के उस लोक में
जहां आलोक बसता है
वाणी का उदय होता है
मौन के उस अनंत साम्राज्य में
जहाँ चेतना निःशंक विचरती है
अहर्निश कोई नाम धुन गूँजती है
शायद वही कृष्ण का परम धाम है
जहाँ मन को मिलता विश्राम है !