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बुधवार, जुलाई 22

भोर

भोर 

बजती हैं चाइम की मधुर घण्टियाँ
प्रातःसमीरण में झूमकर 
पारिजात के फूलों को 
छूकर बहती चली आती है जब वह ! 
लिए आती है संदेश उदित होते नव प्रभात का 
पंछियों के स्वर गान का 
जो अब बस खोलने ही वाले अपने नेत्र 
भोर में प्रकृति कितनी पावन लगती है 
गगन पर बदलियों के पीछे झाँक रहा है 
अभी भी पूनो का चाँद 
पर नजर नहीं आते तारागण 
वह पूनम का चाँद ही तो है खिला-खिला   
वही अपना है जंगल में जैसे 
कोई बिछड़ा मीत मिला 
जानना नहीं है उसे 
अज्ञेय है वह 
पाना भी नहीं है 
कभी खोया ही नहीं वह 
जागना है 
, भूल गया है जो मन उसे याद भर दिलाना है 
अस्तव्यस्तता छायी है जो जीवन में 
उसे सँवारना है 
मिलता है वह भोर और संध्या काल में