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मंगलवार, जनवरी 21

सारे माला के मनके हैं

सारे माला के मनके हैं


सच के सपने देखा करता 

माया में रमता निशदिन मन, 

जाने किसने बंधन डाले 

मुक्त सदा ही मुरली की धुन ! 


अग्निशिखा सा दिप-दिप करता 

भीतर कोई यज्ञ चल रहा,

दैव एक लिखता जाता है 

लेख कर्म के कौन पढ़ रहा !


शून्य वही जो ब्रह्म कहाये 

एक अनूप  लोक गढ़ता है, 

ख़ुद ही ख़ुद को रहे जानता 

चकित हुआ मन जब तकता है !


है अनंत, अनंत का सब कुछ 

जड़-चेतन दोनों उसके हैं, 

वही बनाये वही चलाये 

सारे माला के मनके हैं !


बुधवार, अप्रैल 19

श्वास-श्वास में सिमरन हो जब

श्वास-श्वास में सिमरन हो जब


श्वासों में मत भरें सिसकियाँ 

हैं सीमित उपहार किसी का, 

दीर्घ, अकंपित अविरत  गति हो 

इनमें कोई राज है छुपा !


श्वास-श्वास में सिमरन हो जब

वाणी में इक दिन छलकेगा, 

मन को बाँधे ऐसी डोरी 

श्वासों से ही मधु बरसेगा !


श्वासों का आयाम बढ़े जब 

सारा विश्व समाता इनमें, 

एक ऊर्जा है अनंत जो 

ज्योति वह प्रदाता जिसमें !


श्वासों की माला पहनी है 

भरे सुगंधि मधुराधिपति की, 

इनकी गहराई में जाकर 

द्युति निहारें हृदय  मोती की !