बुधवार, अप्रैल 19

श्वास-श्वास में सिमरन हो जब

श्वास-श्वास में सिमरन हो जब


श्वासों में मत भरें सिसकियाँ 

हैं सीमित उपहार किसी का, 

दीर्घ, अकंपित अविरत  गति हो 

इनमें कोई राज है छुपा !


श्वास-श्वास में सिमरन हो जब

वाणी में इक दिन छलकेगा, 

मन को बाँधे ऐसी डोरी 

श्वासों से ही मधु बरसेगा !


श्वासों का आयाम बढ़े जब 

सारा विश्व समाता इनमें, 

एक ऊर्जा है अनंत जो 

ज्योति वह प्रदाता जिसमें !


श्वासों की माला पहनी है 

भरे सुगंधि मधुराधिपति की, 

इनकी गहराई में जाकर 

द्युति निहारें हृदय  मोती की !



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