तब और अब
देहें तब चमकदार हुआ करती थीं
जिनमें देवों का वास था
थी आदमी और देवता में एक आत्मीयता
और सहयोग की भावना
मनों की शक्तियाँ अकूत थीं
वनस्पतियाँ तक अपने राज खोलती थीं
ध्यान में लीन ऋषि से
गुण धर्म बोलती थीं
दूर नक्षत्रों तक सहज ही गमन करते थे ध्यानी
परमात्मा से तब तक मानव ने रार नहीं थी ठानी
धीरे-धीरे हुई विस्मृति
मद, मान और मोह ने की अवनति
देहें अब मात्र खाद्यान्न भरने का यंत्र हैं
देवों को किया देवालयों में बंद है
दोनों कभी-कभी मिलते हैं
अधिक तो उनके होने पर ही संशय करते हैं
विमुग्ध है मानव निज ज्ञान पर
वंचित है किस सुख से यह भी नहीं जानता
अपने ही स्रोत के अस्तित्त्व को नहीं मानता...
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