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शुक्रवार, अक्टूबर 4

नारी भारत की


नवरात्रि के पावन अवसर पर नारी शक्ति को समर्पित


नारी भारत की

आँखों में निज ऊर्जा की पहचान लिए 

आगे बढ़ते जाने का अरमान लिए, 

अधरों पर नवल विजय की मुस्कान लिए 

नारी भारत की आशा की ख़ान लिए !


रोक सके ना कोई बाधा अब इसको 

वह सबला है जग कहता अबला जिसको, 

नहीं चाहिए अब गहनों का कारावास 

उसे चाहिए खुली धरा खुला आकाश !


न सुंदर वस्त्र न ही लुभाते राजमहल 

उतर पड़ी है करने हर कठिनाई हल, 

वह ख़ुद की ताक़त को पहचान चुकी है 

इस दुनिया की लघुता को जान चुकी है !


जो अब तक बस नीर बहाती है आयी 

बेवजह अपनी अस्मिता गँवाती आयी, 

जिसने सपनों को सदा बिलखते देखा 

वह अब उनको साकार बनाने आयी !


नहीं रुकेंगे इन कदमों को बढ़ने दो 

जग महकेगा, हाथों से  संवरने दो, 

उसे मान दो, उसे चाह सिर्फ़ स्नेह की 

हक़ है उसका समानता का अधिकार दो !





बुधवार, दिसंबर 6

क्यों दिल की साँकल उढ़का ली


क्यों दिल की साँकल उढ़का ली


भरें न कल्पना की उड़ानें 

कैसे नये क्षितिज पायेंगे ? 

नियत सोच में सिमटे रहकर 

बस पुरातन दोहरायेंगे !


जहाँ अनंत कपाट खुले हों 

कैसे कोई घर में बैठे, 

महासमंदर ठाँठे मारे 

क्यों न मुसाफ़िर गहरे पैठे !


पलकों में सपने तिरतें हों 

अंतर भरे उमंग उल्लास, 

अधरों पर हों गीत मिलन के 

जागा रहे पल-पल विश्वास !


दूरी नहीं जरा भी उससे 

जिसका पथ ये कदम ढूँढते, 

अहर्निशम् दीपक जलता है 

नयन मुँदे हों या हों जगते !


कोकिल और पपीहा प्यासे 

अब भी लगन जगे अंतर में, 

चातक तकता नील गगन को 

अब भी मोर नाचते वन में !


जीवन दे उपहार अनोखे 

अपनी ही झोली क्यों ख़ाली, 

सब दे कर भी कभी न चुकता

क्यों दिल की साँकल उढ़का ली ! 


शुक्रवार, जनवरी 8

सपनों से जब पार गया मन

सपनों से जब पार गया मन 

सुंदर सपने, कोमल आशा 

पढ़ी प्रेम की यह परिभाषा,  

सपनों से जब पार गया मन 

संग निराशा छूटी आशा !


उसी प्रेम में उठना सीखा

 जिसमें लोग गिरा करते हैं,

शब्दों का अब भेद खुल गया 

 मतभेद, मनभेद भरते हैं !


मौन समझ लें इकदूजे का 

जब हम ऐसी जगह आ गये, 

सहज शांति, आत्मीयता के 

सान्निध्य में मन गुल खिल गए ! 


अब न कहीं जाना, कुछ पाना 

दो ना एक हुए रहते हैं, 

एक बोलना यदि चाहे तो  

कर्ण दूसरे के सुनते हैं !


सोमवार, दिसंबर 28

अबूझ है मन

अबूझ है मन 

मुँह लगे सेवक सा कब 
हुकुम चलाने लगता है 
पता ही नहीं चलता 

कभी सपने दिखाता है मनमोहक 

कि आँखें ही चौंधियाँ जाएँ

और कभी आश्वस्त करता है 

पहुँचा ही देगा मंजिल पर 

मन की मानें तो मुश्किल 

मनवाएँ उससे यह उससे भी बड़ी 

बुद्धि भी है थक-हार कर खड़ी 

नींद में दुनिया की सैर कराता है 

जागने पर माया के फेर में पड़वाता है 

मासूम सा बना भजन भी गाता है 

कभी पुरानी गलियों में लौटा ले जाता है 

यह पिंजरे का पंछी 

उड़ना ही भूल गया 

इक आस की सींक पर बैठे-बैठे झूल गया

इसको तो बस देखते भर रहना है 

न भागना इससे, न डराना 

निरपेक्ष होना है 

यह मन भी उसी की माया है 

जिसने यहाँ सभी को जाया  है ! 

सोमवार, नवंबर 4

ख्वाब और हकीकत


ख्वाब और हकीकत 

कौन सपने दिखाए जाता है
नींद गहरी सुलाए जाता है

होश आने को था घड़ी भर जब
सुखद करवट दिलाए जाता है

मिली ठोकर ही जिस जमाने से
नाज उसके उठाए जाता है

गिन के सांसे मिलीं, सुना भी है
रोज हीरे गंवाए जाता है

पसरा है दूर तलक सन्नाटा
हाल फिर भी बताए जाता है

कोई दूजा नहीं सिवा तेरे
पीर किसको सुनाए जाता है

टूट कर बिखरे, चुभी किरचें भी
ख्वाब यूँही सजाए जाता है

गुरुवार, फ़रवरी 2

प्रीत बहे धार सी




प्रीत बहे धार सी

मन सपने बुनता है 
फिर-फिर सिर धुनता है,
जीवन की बगिया से 
कांटे ही चुनता है ! 

जन्नत बनाने का 
भीतर सामान है, 
दोजख की आग में 
व्यर्थ ही भुनता है !

स्वयं को ही कैद करे 
झूठी दीवारों में,
ख्वाबों में गाए कभी  
गीत वही सुनता है !

मन जो ठहर जाये 
 डोर कोई थाम ले,
प्रीत बहे धार सी 
मन्त्र सा गुनता है !






बुधवार, जनवरी 4

नींद और जागरण

नींद और जागरण 


खुद का पता भी अक्सर गैरों से पूछते हैं
जाहिर सी बात है कि अब तक भटक रहे  हैं 

ऊँगली जरा दिखायी मुरझाया दिल कमल 
खिल जाये कैसे फिर से तरकीब पूछते हैं 

सपने सजाये रहते दिल की पनाहगाह में 
सच दूसरे करेंगे भ्रम ऐसे पालते हैं 

अपनी खबर नहीं है जग का हिसाब रखते
इक नींद ले रहे हैं लगता है जागते हैं 

गुरुवार, मार्च 12

झर जाते फिर जैसे सपने

झर जाते फिर जैसे सपने



है अनोखा खेल उसका,  गूँज प्यारी पंछियों की
तिर रहे जो नील नभ में, कूक मनहर कोकिलों की !

सुन सकें तो हैं मधुरतम
कण-कण में जो बसे हुए,
दादुर, मोर, पपीहा के स्वर  
मेघ नीर भी सुर में बरसे !

टिप-टिप छन-छन बरसे बादल
पवन जरा हौले से बहती,
पीले पत्तों को शाखों से
लाकर भूमि पर धर देती !

छिप जाते पंछी डालों में
भीगे पंख झाड़ते अपने,
फूल सहा करते बूंदों को
झर जाते फिर जैसे सपने !

सृष्टि की लीला यह अनुपम
युगों-युगों से चली आ रही,
प्रेम भरे कातर नयनों को
उसी अलख की झलक दिखाती !


शनिवार, जुलाई 19

अभी तो जिंदा हैं हम


अभी तो जिंदा हैं हम


दूर खड़ी है अभी तो मौत 
जब आएगी तब आयेगी
अभी तो जी लेने दो
लोग मरते हैं उन्हें मरने दो
अभी तो जिंदा हैं हम
अभी से क्यों करें उसका गम
अभी होश में आने को मत कहो
अभी तो देखने दो सपने
अभी तो झटक डालो यह बात भी
अभी तो दिन है न कहो
कभी आएगी रात भी
 ये जलती हुई चिताएं औरों की हैं
ये धूल में दबी देह अपनी तो नहीं
जो राख हो गये वे दूसरे हैं
 अभी तो खेलने खाने के दिन हमारे हैं....

गुरुवार, फ़रवरी 21

यह दिन भला-भला लगता है


यह कविता मैंने अपनी उस सखी के लिए लिखी है, जो उम्र के चौथे दशक के आखिरी पड़ाव में कार चलाना सीख रही है, आज उसके विवाह की छब्बीसवीं सालगिरह है.
यह दिन भला-भला लगता है 

नहीं भरोसा रहा तुम्हारा
चुपके-चुपके क्या कर डालो,
कार चलाना सीख रही हो
घर संग, स्टीयरिंग भी सम्भालो !

शॉपिंग करती, पहनो मैचिंग
दूर-दूर तक जाओ घूमने,
पूरी करो हसरतें दिल की
नहीं अधूरे रहें ये सपने !

तुम भी तो मन के मालिक हो
टीवी के ऐसे दीवाने, 
रहे कैमरा हाथों में या
वाह, वाह ! के सुनो फसाने !

सेहत देख आपकी अब तो
किचन में सारे व्यंजन बनते,
जो तुमको रुचता हो अक्सर
सालन भाजी वही तो बनते !

प्रिय पुत्री है गर्व हमारा
दोनों की आदतें हैं जिसमें,
वही साक्षी हम दोनों की
प्रेम हमारा झलके उसमें !

सेवा कर माँ को खुश रखें
यही प्रयास चला करता है,
जीवन के क्रम चलते रहते
यह दिन भला-भला लगता है !