शुक्रवार, जुलाई 9

कोई है

कोई है

सुलग रहा है रह-रह कर दिल
जाने कैसी पीड़ा छाई,
पलकों के पीछे से कोई
झांक रहा न दिया दिखाई I

भीतर ही भीतर यह कैसी
शक्ति का विस्फोट हो रहा,
बाहर आने को है व्याकुल
पर न कोई मार्ग पा रहा I

व्यर्थ न जाएँ सांसें देखो
व्यर्थ न हों जीवन का प्याला,
भीतर जो है अमृत का घट
भीतर जो छा गया उजाला I

भरा हुआ कृपा का बादल
बरस रहा है हर पल हम पर,
अहम् का छाता लिया लगाये
भिगो न पाता बहता निर्झर I

पल भर खाली हो कर देखें
पाएँ भीतर परम प्रकाश,
बांटें फिर कण-कण में उसको
भीतर पालें जो आकाश !


अनिता निहालानी
९ जुलाई २०१०

5 टिप्‍पणियां:

  1. सही दिशा की ओर प्रेरित सुन्दर रचना...

    कृपया कमेंट्स की सेटिंग से वर्ड वेरिफिकेशन हटा दें ..टिप्पणी करना आसान हो जायेगा

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  2. संगीताजी, कविता पर आपकी प्रतिक्रिया पढ़कर अच्छा लगा. वर्ड वेरीफिकेशन हटा रही हूँ, धन्यवाद.

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  3. पल भर खाली हो कर देखें
    पाएँ भीतर परम प्रकाश,
    बांटें फिर कण-कण में उसको
    भीतर पालें जो आकाश !
    nihsandeh... gudh sandesh

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  4. पल भर खाली हो कर देखें
    पाएँ भीतर परम प्रकाश,
    बांटें फिर कण-कण में उसको
    भीतर पालें जो आकाश !

    अनीता जी नमस्कार ,
    आपके लेखन का एक-एक शब्द मूल्यवान है ..!!
    इसीलिए पुरानी कविताओं को सामने लाने का प्रयास है ये ...!
    ये कविता भी अद्भुत है .
    मैंने इसे नयी-पुरानी हलचल पर लिया है|आप आयें और अपने विचार दें
    मेरी पुरानी कविता भी पढ़ें मुझे ख़ुशी होगी.
    http://nayi-purani-halchal.blogspot.com/

    anupama tripathi.

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  5. बहुत अच्छी भावनाओं को समेटे है यह कविता.

    सादर

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