गुरुवार, अप्रैल 26

दृश्य नहीं वह द्रष्टा है


दृश्य नहीं वह द्रष्टा है
  
वह कैद नहीं है मंदिर में
दृश्य नहीं वह द्रष्टा है,
 नाम-रूप में बंध न सके
सृष्टि नहीं वह सृष्टा है !

झांक रहा इन नयनों से
श्रवणों से शब्द वही धारे,
कोमलतम स्पर्श उसी से हैं
उससे ही भाव उठे सारे  !

वह बन विद्युत तन में दौड़े
मन-प्राण उसी के बल पर हैं,
वह सहज सदा रहता भीतर
दूरी न हमसे पल भर है !

उसमें विश्राम करे कोई
सँवर गया निज दर्पण में,
पल भर भी ध्यान धरे कोई
खो जाता दिल की धड़कन में !

ज्यों बालक माँ से विमुख हुआ
बस खेल खिलौनों से खेले,
जीवन की उथल-पुथल कैसी
वह देख रहा कुछ न बोले !

वह देखे ही जायेगा, गर
हम रुक कर उसको न चीन्हें
है धैर्य, बड़ी करुणा उसमें
निजता को तिल भर न छीने !  

8 टिप्‍पणियां:

  1. वाह
    बहुत सुंदर!!
    मनभावन रचना अनीता जी...

    सादर.

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  2. सत्य से साक्षात्कार कराती सुन्दर रचना, सरल और सुबोध शब्दों में.

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  3. उसमें विश्राम करे कोई
    सँवर गया निज दर्पण में,
    पल भर भी ध्यान धरे कोई
    खो जाता दिल की धड़कन में !
    ्यही तो वास्तविक सत्य है …………सशक्त अभिव्यक्ति।

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  4. उसमें विश्राम करे कोई
    सँवर गया निज दर्पण में,
    पल भर भी ध्यान धरे कोई
    खो जाता दिल की धड़कन में

    हाँ धीरे धीरे चलना सीख रहें है ।

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  5. वह कैद नहीं है मंदिर में
    दृश्य नहीं वह द्रष्टा है,
    नाम-रूप में बंध न सके
    सृष्टि नहीं वह सृष्टा है !

    जीवन की सच्चाई बस इतनी ही है.....
    और समझने में हम जिंदगी बिता देते हें.....!

    बहुत सुंदर.....
    अद्भुत...!!

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  6. अहा ! मन को सच में विश्राम मिलता है आपको पढ़कर..

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  7. सृष्टि के कण-कण में उसका ही विराट रूप समाया हुआ है। हम सब उसके अंश मात्र हैं।

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