बुधवार, अप्रैल 11

भीतर एक यात्रा चलती



भीतर एक यात्रा चलती


जीवन एक सफर है सुंदर
चलते ही जाना है नियति,
जन्म पूर्व ही शुरू हुआ जो
न मृत्यु में भी पूर्णाहुति !

चलते जाना बने सार्थक
नए अनूठे रंग भरें नित,
जीवन की गहराई छू लें
सँग भी चलें अपनों के हित !

श्वासें लेना नहीं है काफ़ी
बिखरे, बंटे सदा यह जीवन
प्रेम, समर्पण, शांति, आस्था
महकाए नित मन का उपवन !

भीतर एक यात्रा चलती
बाहर, ज्यों-ज्यों कदम बढाते,
ऊँचाई सँग, गहराई भी
स्नेहिल नाते ज्यों गहराते !  

जड़ता या प्रमाद न आये
मन में कभी दुराव न छाये,  
निर्मल जल सा सदा बहे यह
दौड़ कभी खुद से न छुड़ाए !

स्वयं से शुरू हुआ सफर यह
स्वयं पर ही आकर थमता है,
गुनगुन करतीं राहें मिलतीं
भीतर जब दीया जलता है !  


9 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत बढिया रचना है बधाई स्वीकारें।

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  2. बहुत सुंदर रचना अनीता जी...

    श्वासें लेना नहीं है काफ़ी
    बिखरे, बंटे सदा यह जीवन
    प्रेम, समर्पण, शांति, आस्था
    महकाए नित मन का उपवन !

    बहुत खूब!!

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  3. स्वयं से शुरू हुआ सफर यह
    स्वयं पर ही आकर थमता है,
    गुनगुन करतीं राहें मिलतीं
    भीतर जब दीया जलता है !

    ...बहुत सुन्दर और प्रेरक रचना..आभार

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  4. स्वयं से शुरू हुआ सफर यह
    स्वयं पर ही आकर थमता है,
    गुनगुन करतीं राहें मिलतीं
    भीतर जब दीया जलता है !

    बहुत बहुत बहुत सुन्दर।

    उत्तर देंहटाएं
  5. स्वयं से शुरू हुआ सफर यह
    स्वयं पर ही आकर थमता है,
    गुनगुन करतीं राहें मिलतीं
    भीतर जब दीया जलता है !

    बहुत सुंदर यही है जीवन का सत्य

    उत्तर देंहटाएं
  6. भीतर एक यात्रा चलती
    बाहर, ज्यों-ज्यों कदम बढाते,
    ऊँचाई सँग, गहराई भी
    स्नेहिल नाते ज्यों गहराते
    बहुत बढि़या।

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  7. सुंदर अतिसुन्दर अच्छी लगी, बधाई

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  8. भीतर एक यात्रा चलती
    बाहर, ज्यों-ज्यों कदम बढाते,
    ऊँचाई सँग, गहराई भी
    स्नेहिल नाते ज्यों गहराते !

    एक सफ़र......
    बाहर भी.....भीतर भी....

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  9. बाली जी, अनु जी, कैलाश जी, इमरान, पूनम जी, सदा जी, संगीता जी व सुनील जी आप सभी का स्वागत व आभार!

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