बुधवार, अप्रैल 25

एक अनोखा खेल चल रहा बड़े प्रेम से कोई छल रहा


एक अनोखा खेल चल रहा
बड़े प्रेम से कोई छल रहा


खोजने व्यर्थ को जब दौड़ते फिरे हम
 सार्थक घर आने को बेताब ही था

राह तकते जिसकी बिछाए रहे पलकें
आने वाला वह आया ही हुआ था

हजारों खत न जिसे भेजे होंगे
परदेश वह कभी गया ही नहीं था

याद कर करके जिसे थकते नहीं
दिल ने उसे भुलाया ही कब था

मांगी मनौतियां विनतियाँ भेजीं
हाले दिल उससे छिपा ही न था

 पुकारें किसे राह निहारें किसकी
वहाँ कभी कोई दूसरा नहीं था



7 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर कविता, भाव भरे शब्दों के साथ

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  2. पुकारें किसे राह निहारें किसकी
    वहाँ कभी कोई दूसरा नहीं था

    ...बहुत गहन और सुन्दर प्रस्तुति...आभार

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  3. वाह वाह.....वो तो कभी दूर ही न था हम ही भटका किये ।

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  4. इस खेल में हम बार-बार छले ही तो जाते हैं। फिर भी इस खेल में जुटे हैं।

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    1. मनोज जी, यह खेल लुभाता जो है, पर इसकी चमक बस ऊपरी ही है, एक बार इसकी असलियत का पता चल जाये तो यह अपने वास्तविक रूप में आ जाता है और तब इसकी चमक और भी बढ़ जाती है.

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  5. expression ने आपकी पोस्ट " एक अनोखा खेल चल रहा बड़े प्रेम से कोई छल रहा " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    वाह.............

    याद कर करके जिसे थकते नहीं
    दिल ने उसे भुलाया ही कब था

    बहुत बढ़िया...

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