सोमवार, अप्रैल 23

बनारसी दावत


यात्रा के दौरान बनारस में हम एक परिवार से मिलने गए जिनके यहाँ पान का व्यवसाय होता है, पुराने टाईप का बड़ा सा घर था और शेष पढ़िये इस कविता में....

बनारसी दावत

एक स्कूटर, एक बाइक
एक किया आटोरिक्शा,
चले सभी मिल एक साथ
लक्ष्य था घर उनका !

भीड़ भरा हर चौराहा था
चौकाघाट से चली सवारी,
लहुराबीर से सिगरा होके
औरंगाबाद की आयी बारी !

नीचे था पान गोदाम
पान सहेजे गिने जा रहे,
घर के लोग भी सँग औरों के
हरे पान को छांट रहे

अम्मा की तस्वीर पुरानी
याद दिलाती दिवस पुराने !
झुक-झुक बच्चे पैर छू रहे
ऊपर मिले सभी सयाने !

घर में इक मंदिर सजा था
देवी पूजा का आयोजन,
एक दीप अखंड जल रहा
सुबह-शाम जहाँ होता वन्दन !

सभी बैठ मिल बातें करते
तभी नाश्ते सम्मुख आये,
बर्फी, लड्डू, और समोसे
काजू और मखाने लाए !


गाजर का हलवा स्वादिष्ट
आलू के कटलेट भी आये,
खट्टी, मीठी चटनी के सँग
एक-एक को थे सब भाए !

साबूदाने की फिर खिचड़ी
मठरी, भुजिया कुरमुरी थी,
अंत में मिली चाय बनारसी
ऐसी अद्भुत आवभगत की !

तीसी, खसखस के लड्डू थे
शुद्ध घी में डूबे पूरे,
इससे भी बढ़कर थे दिल वे
बच्चों, बड़ों सभी के प्यारे !



8 टिप्‍पणियां:

  1. वाह क्या सुंदर वर्णन बनारस की यात्रा का. खाने का स्वाद भी कुछ कुछ आने लगा है.

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  2. कविता के माध्यम से खातिरदारी का हाल बयाँ करना मुश्किल काम था मगर आपने तो कमाल कर दिया बधाई

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  3. रविकर जी,कैलाश जी, रचना जी और सुनील जी आप सभी का स्वागत इस दावत में,आभार!

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  4. geetachandna ने आपकी पोस्ट " बनारसी दावत " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    वाह,क्या खातिरदारी है!और फिर उसका ऐसा अद्भुत वर्णन !



    geetachandna द्वारा मन पाए विश्राम जहाँ के लिए 24 अप्रैल 2012 1:46 pm को पोस्ट किया गया

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  5. इमरान अंसारी ने आपकी पोस्ट " बनारसी दावत " पर एक टिप्पणी छोड़ी है:

    मज़ा आ गया होगा ऐसी दावत का :-)



    इमरान अंसारी द्वारा मन पाए विश्राम जहाँ के लिए 24 अप्रैल 2012 12:47 pm को पोस्ट किया गया

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  6. पिछले दो बार से कुछ कमेन्ट आते हैं पर प्रकाशित नहीं होते, क्या आ प में से किसी के साथ ऐसा हुआ है, मैंने इसलिए कॉपी-पेस्ट कर दिए हैं.

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