मन कहाँ ख़ाली हुआ है
यह ग़लत है, वह ग़लत है
ग़लत है सारा जहाँ,
बस सही हम जा रहे, यह
राह रोके क्यों खड़ा ?
क्यों नहीं उड़ते गगन में
देर अब किस बात की,
थी तैयारी इस पल की
बात क्या फिर राज की !
ढेर बोझा है दिलों पर
अनगिनत शिकवे छिपे,
मन कहाँ ख़ाली हुआ है
तीर कितने हैं बिंधे !
आग भी जलती, वहीं है
प्रीत का दरिया छिपा,
जाग कोई देखता, कब
तमस में मन आ घिरा !



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