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बुधवार, दिसंबर 27

मन कहाँ ख़ाली हुआ है

मन कहाँ ख़ाली हुआ है 


यह ग़लत है, वह ग़लत है 

ग़लत है सारा जहाँ, 

बस सही हम जा रहे, यह 

राह रोके क्यों खड़ा ?


क्यों नहीं उड़ते गगन में 

देर अब किस बात की, 

थी तैयारी इस पल की 

बात क्या फिर राज की !


ढेर बोझा है दिलों पर 

अनगिनत शिकवे छिपे, 

मन कहाँ ख़ाली हुआ है 

तीर कितने हैं बिंधे !


आग भी जलती, वहीं है  

प्रीत का दरिया छिपा, 

जाग कोई देखता, कब  

तमस में मन आ घिरा !


मंगलवार, दिसंबर 7

संध्या बेला

संध्या  बेला  

तमस की काली रात्रि 
अथवा रजस का उजला दिन 

दोनों रोज ही मिलते हैं 

अंधकार और प्रकाश के 

इस खेल में हम नित्य ही स्वयं को छलते हैं 

चूक जाती है दोनों के 

मिलन की सन्ध्या बेलायें 

जब प्रकाश और तम एक-दूसरे में घुलते हैं 

उस सलेटी आभा में 

सत छिपा रहता है 

पर कभी अँधेरा कभी उजाला 

उसे आवृत किये रहता है 

वही धुधंला सा उजास ही 

उस परम की झलक दिखाता है 

जब मन की झील स्वच्छ हो और थिर भी 

तभी उसमें पूर्ण चंद झलक जाता है 

न प्रमाद न क्रिया जब मन को लुभाती है

तब ही उसकी झलक मिल पाती है  !


रविवार, अक्टूबर 22

एक दीप बन राह दिखाए

एक दीप बन राह दिखाए


अंतर दीप जलेगा जिस पल
तोड़ तमस की कारा काली,
पर्व ज्योति का सफल तभी है
उर छाए अनन्त उजियाली !

एक दीप बन राह दिखाए
मन जुड़ जाए परम् ज्योति से,
अंधकार की रहे न  रेखा
जगमग पथ पर बढ़े खुशी से !

माटी का तन करे उजाला
आत्मज्योति शक्ति बन चमके,
नयन दीप्त हों स्मित अधरों पर
शब्द-शब्द मोती सा दमके !

जीवन सुधा अखण्ड प्रवाहित
कण भर से ही सृष्टि उमगती,
दामन थाम लिया जिसने भी
बन जाता हर हृदय सुख ज्योति !

रविवार, जुलाई 9

गुरू पूर्णिमा के अवसर पर


गुरू पूर्णिमा के अवसर पर


युगों-युगों से राह दिखाते
उर-अंतर का तमस मिटाते,
ज्योति शिखा सम सदा प्रज्ज्वलित
सीमाओं में नहीं समाते !

प्रेम, ज्ञान, सुख पुंज शांति के
सुमन खिलाते परा भक्ति के
बिना भेद दिल से अपनाया
बंधन तोड़कर आसक्ति के !

विश्व बना परिवार तुम्हारा
सदा साथ रह बने सहारा
हो अनंत अनंत से मिलकर
सागर भी तुम तुम्हीं किनारा !

अपना जान तुम्हें जो भजता
शांति, ज्ञान से दामन भरता,
बाहर जो सुख ढूँढ़ रहा था
खुद के भीतर ही पा जाता !

जीवन मर्म, भेद समझाया
तुमने अपना आप दिखाया,
दुःख, पीड़ा आते-जाते हैं
सत्य शाश्वत ज्ञान बरसाया !

तुम क्या हो बस तुम्हीं जानते
निरख अदा हम वारी जाते,
जो आत्म निर्दोष है भीतर
उसकी आहट पा खिल जाते !

गुरू पूर्णिमा साँझ दिव्य है
महिमा गुरू की नित भव्य है,
नतमस्तक हो नमन करें हम
चरण धूलि गुरू की सेव्य है ! 

सोमवार, नवंबर 5

हर जगह है हाथ कोई


हर जगह है हाथ कोई

बेसुरी न बांसुरी हो
शहद जैसी माधुरी हो,
जिंदगी यह कीमती है
ज्यों कमल की पाँखुरी हो !

प्रीत सुर भीतर जगे
शांति का उपवन उगे,
बोल जो भी सहज फूटें
चाशनी में हों पगे !

सत्य जब आकार लेगा
सहज सब स्वीकार होगा,
जो थे हम वह ही दिखें
बस यही संदेश देगा !

गूँजता अस्तित्व सारा
ज्योतियों से तमस हारा,
हर जगह है हाथ कोई
राह दे, देकर सहारा !