गुरुवार, सितंबर 19

चलो, अब घर चलें


चलो, अब घर चलें


बहुत घूमे बहुत भटके
कहाँ-कहाँ नहीं अटके,
 बहुत रचाए खेल-तमाशे
बहुत कमाए तोले माशे !

अब तो यहाँ से टलें
चलो अब घर चलें !

आये थे चार दिन को
 यहीं धूनी रमाई,
 यहीं के हो रहे हैं
पास पूंजी गंवाई !

यादें अब उसकी खलें
चलो अब घर चलें !

कुछ नहीं पास तो क्या
 वहाँ भरपूर है आकर
पिता का प्यार माँ का नेह  
बुलाते प्रीत के आखर

आये तो थे अच्छे भले
चलो अब घर चलें !



11 टिप्‍पणियां:

  1. आये थे चार दिन को
    यहीं धूनी रमाई,
    यहीं के हो रहे हैं
    पास पूंजी गंवाई !

    बढ़िया प्रस्तुति !
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  2. कितना भी धूनी रमाये पर घर तो जाना ही है..
    यही तो सुकून का ठिकाना है..

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  3. बढ़िया प्रस्तुति आदरणीया-
    आभार आपका-

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  4. कल 21/09/2013 को आपकी पोस्ट का लिंक होगा http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर
    धन्यवाद!

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  5. घर तो घर ही होता है. सतत चुम्बकीय आकर्षण की तरह हमेशा खींचता रहता है. सुन्दर रचना.

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  6. आप सभी सुधीजनों का स्वागत व आभार !

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  7. बहुत ही सुन्दर सच .... एक दिन लौट के घर ही आना होता है |

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  8. वाह!

    घर लौटते वक्त प्यार की गठरी का एहसास हो तो क्या कहने! बाकी तो रोते-रीते मन से रूख़सत होते हैं यहाँ से।

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