गुरुवार, जून 19

मधुर अमराई में बदले


मधुर अमराई में बदले


थामता है हर घड़ी वह
जो बरसता प्रीत बनकर,
खोल देता द्वार दिल के
फिर सरसता गीत बन कर !

हर नुकीले रास्ते को
मृदु गोलाई में बदले,
कंटकों से जो भरी थी
मधुर अमराई में बदले !

मरहम रखता दर्द हरता
हर कदम पर साथ देता,
पोंछ देता दुःख इबारत
या नये से अर्थ देता !

बूंद बनकर जो मिला था
सिन्धु सा वह बढ़े आता,
रोशनी की इक किरण था
बन उजाला चढ़े आता !

दूर से था जो पुकारे
बस गया है दिल में आके,
डाल डेरा और डंडा
पा गया हो ज्यों ठिकाने ! 

6 टिप्‍पणियां:

  1. बूंद बनकर जो मिला था
    सिन्धु सा वह बढ़े आता,
    रोशनी की इक किरण था
    बन उजाला चढ़े आता !
    भावपूर्ण सहज और गहन अभिव्यक्ति .... !!

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  2. थामता है हर घड़ी वह
    जो बरसता प्रीत बनकर,
    खोल देता द्वार दिल के
    फिर सरसता गीत बन कर !

    प्रीत की रीत निराली मतवाली

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  3. बूंद बनकर जो मिला था
    सिन्धु सा वह बढ़े आता,
    रोशनी की इक किरण था
    बन उजाला चढ़े आता !

    .....बहुत सही कहा आपने .... बेहतरीन अभिव्‍यक्ति !

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    1. रंजना जी, वीरू भाई, ओंकार जी, संजय जी तथा यशवंत जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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