रविवार, जून 29

खोल पंख नव इतराता है

खोल पंख नव इतराता है


मुक्त हुआ मन खो जाता है
अब वह हाथ कहाँ आता है,
अनथक जो वाचाल बना था
अब चुपचुप सा मुस्काता है !

प्रियतम का जो पता पा गया
अनजाने का संग भा गया,
छू आया अंतिम सीमा जो
खोल पंख नव इतराता है !

भांवर डाली जिसने पी संग
चूनर कोरी दी श्यामल रंग,
किसकी राह तके अब बैठा
गीत मिलन क्षण-क्षण गाता है !

सुधियाँ भी अब कहाँ सताती
चाह दूजे की नहीं रुलाती,
एक लहर उठती मन सागर
बस इक वही नजर आता है !

स्वप्न खो गये दूर गगन में
 उड़ी कल्पना कहीं पवन में,
 विकसित सरसिज एक अनोखा
उर उपवन को महकाता है !


10 टिप्‍पणियां:

  1. आभार आपका-
    सटीक प्रस्तुति-

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  2. सुन्दर प्रवाहमय गीत ...

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  3. सुन्दर शब्द चयन अप्रतिम गीतात्मक रचना।

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  4. मानस में खिले सरोज की सुगंध इन पंक्तियों में समाई हुई है !

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  5. वही मन जो दुश्मन लगता था अब परम सखा बन गया .....अति सुन्दर भाव |

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  6. अनुपमा जी, रविकर जी, सतीश जी, दिगम्बर जी, वीरू भाई, प्रतिभा जी, तथा कुंवर जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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