बुधवार, अप्रैल 8

एक अनंत गगन है भीतर


एक अनंत गगन है भीतर

नाच उठे जो कैद है भीतर
खेल चल रहा कोई सुंदर,
एक ऊर्जा गाती प्रतिपल
एक ऊर्जा सुनती हर स्वर !

जीवन एक सुहृद मित्र सा
प्रतिक्षण ऊंचा ही ले जाता,
एक अनंत गगन है भीतर
फिर क्यों घर का आंगन भाता !

तोड़ के सारे झूठे बंधन
अभय प्राप्त यदि कर लेगा मन,
नई नई राहें खोजेगा
सहज उड़ान भरेगा चेतन ! 

5 टिप्‍पणियां:

  1. मन की क्षमता असीम है. जब यह मोह माया बंधनों से मुक्त हो जाता है तो स्वयं तीव्र हो जाती है गति अनंत यात्रा में...बहुत सुन्दर और प्रभावी रचना..

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  2. सुन्दर व सार्थक प्रस्तुति..
    शुभकामनाएँ।

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  3. अनंत गगन है मुक्त उड़ान के लिये ,पग रख कर थिर रहने का आधार है घर .

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  4. कैलाश जी, संजू जी, ओंकार जी व प्रतिभा जी आप सभी का स्वागत व आभार !

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