मंगलवार, अप्रैल 28

पुनर्जीवन

पुनर्जीवन


खून से लथपथ तन
भय से सिकुड़े मन
भूकम्प की इस विनाश लीला ने
लील डाले कितने ही जीवन
टूटे घर ढही इमारतें
धंसी सड़कें खो गये रस्ते
चारों ओर छाया है मातम
कैसा मनहूस है यह आलम
प्रकृति जो माँ बन कर पालती थी
आज रूप धर काली का डराती है
लोरी गा, थपकियाँ दे सुलाती थी
आज अजनबी नजर आती है !
किन्तु पुनः होगा सृजन पुनः घर बसेंगे
संवर जाएगी भूमि कर्मठ हाथों से
गूँजेगी हंसी, नव जीवन पनपेंगे
सृष्टि और प्रलय का यह खेल चलता है संग-संग
रात और दिन की तरह  बदलता है विश्व रंग !


6 टिप्‍पणियां:

  1. सही कहा है उत्थान और पतन प्रकृति का नियम है … पुनः होगा सृजन पुनः घर बसेंगे

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  2. प्रकृति से अनुकूलता स्थापित कर जीवन-यापन करने में ही जीव-जगत का कल्याण है - मनुष्य को यह अच्छी तरह समझ लेनी चाहिये .

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  3. अनीता जी,
    माँ को सदैव अन्यथा लेना कि वो तो माँ है हमेशा दुलार ही करेगी चाहे हम जो भी करते रहें. ऐसे ही भारी पड़ जाता है.माँ कि ममता का कोई मोल नहीं पर उसे सम्मान दे

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  4. दुखद।
    मानव असहाय है प्रकृति के आगे।

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  5. Bahut Sahi kaha hai Aapne...
    Prakrati ke rahasya koi nahi jaan pata hai

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  6. संध्या जी, प्रतिभा जी, रचना जी व अभिषेक जी, आप सभी का स्वागत व आभार !

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