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मंगलवार, अप्रैल 28

पुनर्जीवन

पुनर्जीवन


खून से लथपथ तन
भय से सिकुड़े मन
भूकम्प की इस विनाश लीला ने
लील डाले कितने ही जीवन
टूटे घर ढही इमारतें
धंसी सड़कें खो गये रस्ते
चारों ओर छाया है मातम
कैसा मनहूस है यह आलम
प्रकृति जो माँ बन कर पालती थी
आज रूप धर काली का डराती है
लोरी गा, थपकियाँ दे सुलाती थी
आज अजनबी नजर आती है !
किन्तु पुनः होगा सृजन पुनः घर बसेंगे
संवर जाएगी भूमि कर्मठ हाथों से
गूँजेगी हंसी, नव जीवन पनपेंगे
सृष्टि और प्रलय का यह खेल चलता है संग-संग
रात और दिन की तरह  बदलता है विश्व रंग !