मंगलवार, जून 28

स्वप्नों की इक धारा बहती

स्वप्नों की इक धारा बहती



भाव जगें कुछ नूतन पल-पल
शब्दों की इक माल पिरो लें,
प्रीत निर्झरी सिंचित करती
उर का कोना एक भिगो लें !

स्वप्नों की इक धारा बहती
हुए सजग बस दिशा मोड़ दें,
सुख ही जहाँ बरसता निशदिन
पावन ऐसा चौक पूर दें !

कह डालें कुछ पुष्प मौन के
अनगाये से राग बोल दें,
सुरभि शांति गीत अव्यक्त सी
निज जल, उसकी राह खोल दें !




4 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत सुन्दर सकारात्मकता से परिपूर्ण भावनाएं ...

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  2. स्वागत व आभार संध्या जी..

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  3. कल्पना कल्पना रह जाती है ,यथार्थ कुछ और ही होता है - संसार को सुंदर बनाने की संभावनायें ,आज के परिप्रेक्ष्य में और कठिन हो गई हैं .

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  4. सही कह रही हैं आप प्रतिभाजी किन्तु प्रयत्न तो जारी रखना होगा..परमात्मा भी अभी तक सृजन किये ही जा रहा है..उसकी शक्ति ही आत्मा को निरंतर गतिशील रखती है

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