सोमवार, जून 12

लौट चलें क्यों ना अपने घर


लौट चलें क्यों ना अपने घर


गर तलाश सुकून की दिल में
भटक-भटक यदि ऊब गया उर,
राह तके कोई बैठा है
लौट चलें क्यों ना अपने घर !

ठोकर ही खायी हो जिसने
पलकों पर यह उसे बिठाये,
सदा मुखौटा ही ओढ़ा हो
सहज सादगी से देगा भर !

स्वर्ग-नर्क, सुख-दुःख के सपने
नहीं दिखाता कभी किसी को,
सौगातें अनमोल लिए यह
सहज लुटाता जीवन  के स्वर !

नहीं माँगता कीमत कोई
मोल बिना बिकने को आकुल
धूल छान ली हो जग की तो
झुका दें निज द्वार यह अंतर !




2 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन विश्व बालश्रम निषेध दिवस और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। कृपया एक बार आकर हमारा मान ज़रूर बढ़ाएं,,, सादर .... आभार।।

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  2. बहुत बहुत आभार हर्षवर्धन जी !

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