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बुधवार, अप्रैल 27

फ़लसफ़ा ज़िंदगी का



फ़लसफ़ा ज़िंदगी का


कभी सुकून कभी बेताबी बन कर छा गया 

वह क्या था जो अक्सर इस दिल को भरमा गया 


पहरों बैठ कर सुलझाये थे सवाल जिसके 

वह दिलेफूल तो इक पल में ही मुरझा गया 


सही था ग़लत मान बैठे थे जिसको कब से 

फ़लसफ़ा ज़िंदगी का इक बच्चा समझा गया 


कभी तन्हा तो कभी सजी महफ़िलें संग-संग 

इस उड़नखटोले पर भला कौन बैठा गया 


अंधेरे बढ़ गए दुनिया में यकीं जब हुआ 

कौन चुपचाप आके दिल को फिर सहला गया 


हारा सच जीत झूठ की हुई होगी जग में 

सच का बिरवा ख़ुदा फिर से मन में लगा गया 


गुरुवार, जुलाई 2

अस्तित्त्व और हम

अस्तित्त्व और हम 

सुकून झरता है 
उसी तरह...  जैसे जल 
हम उपेक्षा का छाता लगाए 
बच निकलते हैं 
काश ! अस्तित्व के साथ यूँ होता मिलन
जैसे टकराते हैं दो पात्र निकट आकर सहजता से 
और फ़ैल जाती है संगीत की स्वर लहरी !

मिलन तो निरन्तर घटेगा 
उसी से उपजे हैं 
उसी में रहेंगे.... 
इस मिलन से बह सकता है 
मधुर गीत 
या फूट सकती हैं ज्वालायें !

उसके साथ यदि टकराई  लहर 
जो सागर अनंत है 
तो खो जाएगी...
 चाहे तो लहराए उसके विशाल प्रांगण में 
संगीत गुंजाए.... नाचे 
सूर्य की किरणों में 
सतरँगी आभा बिखराये !

कभी निकल पड़े आकाश की यात्रा पर 
फिर बदली संग बरस जाए
मानसरोवर  या हिमालय शिखर पर
प्रकृति के साथ संघर्ष हुआ 
तो रोना ही होगा 
न जाना यह भेद तो 
हर युग में मानव को को-रोना ही होगा !

सोमवार, जून 12

लौट चलें क्यों ना अपने घर


लौट चलें क्यों ना अपने घर


गर तलाश सुकून की दिल में
भटक-भटक यदि ऊब गया उर,
राह तके कोई बैठा है
लौट चलें क्यों ना अपने घर !

ठोकर ही खायी हो जिसने
पलकों पर यह उसे बिठाये,
सदा मुखौटा ही ओढ़ा हो
सहज सादगी से देगा भर !

स्वर्ग-नर्क, सुख-दुःख के सपने
नहीं दिखाता कभी किसी को,
सौगातें अनमोल लिए यह
सहज लुटाता जीवन  के स्वर !

नहीं माँगता कीमत कोई
मोल बिना बिकने को आकुल
धूल छान ली हो जग की तो
झुका दें निज द्वार यह अंतर !