शुक्रवार, अगस्त 18

स्वप्न देखे जगत सारा

स्वप्न देखे जगत सारा 

झिलमिलाते से सितारे
झील के जल में निहारें,
रात की निस्तब्धता में
उर उसी पी को पुकारे !

अचल जल में कीट कोई
कोलाहल मचा गया है,
झूमती सी डाल ऊपर
खग कोई हिला गया है !

दूर कोई दीप जलता
राह देखे जो पथिक की,
कूक जाती पक्षिणी फिर
नींद खुलती बस क्षणिक सी !

स्वप्न देखे जगत सारा
रात्रि ज्यों भ्रम जाल डाले,
कालिमा के आवरण में
कृत्य कितने ही निभा ले !


9 टिप्‍पणियां:

  1. अनीता जी आपने "अपने बारे" में जो लिखा है कि यह अनंत सृष्टि एक रहस्य का आवरण ओढे़ हुए है, काव्य में यह शक्ति है कि उस रहस्य को उजागर करे या उसे और भी घना कर दे, लिखना मेरे लिए सत्य के निकट आने का प्रयास है--आपकी प्रस्तुत कविता आपके इसी मधुर दर्शन का प्रतिनिधित्व करती हुई प्रतीत होती है। चार अंतरों में आपकी यह कविता जीवन के बारे में कितना कुछ, कितने दार्शनिक व इष्टतम तरीके से अन्तर्भूत अनुभवों को व्यक्त कर रही है कि लगता है यह कविता कालजय के क्रम में प्रविष्ट हो जानी चाहिए। वास्तव में इस कविता के माध्यम से कविता का मौलिक तथा प्राकृतिक रंग-स्वरूप-सुंदरता-आकर्षण सब कुछ अत्यन्त माधुर्यातिरेक से प्रकट हो रहा है। अनीता जी इस कविता के लिए आपको अत्यंत शुभकामनाएं और बधाई। मैं चाहूंगा कि यह कविता ब्लॉग जगत के पाठकों के अतिरिक्त अन्य गैर-कम्प्यूटर जानकार पाठक भी पढ़ें। अतः इसे किसी पत्र या पत्रिका के लिए भी भेजें। यदि आप अपनी मेल आइडी दें तो मैं आपको कुछ पत्रों के संबंधित संपादकों की मेल आइडी दूं। आप उन्हें इसे भेज दें।

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  2. विकेश जी, कविता आपको पसंद आयी और आपने विस्तृत टिप्पणी लिखकर अपनी भावना व्यक्त की, इसके लिए आभार ! यदि आप चाहें तो खुशी से इसे पढ़ने के लिए किसी को भी भेज सकते हैं, मेरे लिए ब्लॉग पर इसे पढ़े जाना ही पर्याप्त है.

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    1. बात ये है कि पत्रिकाओं को आपका पता और सम्पर्क नंबर भी चाहिए होता है, ताकि रचना प्रकाशित होने पर आपको मानदेय भेजा जा सके। यदि आप अपना पत्राचार पता दें तो मैं आपकी रचना पत्रों के साहित्य पृष्ठ के लिए भेज दूंगा।

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  3. बहुत ही सुन्दर तालमेल आपकी कोमल भावनाओं का शब्दों के साथ आभार ,"एकलव्य"

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  4. गंभीर भावात्मक प्रस्तुति। चंद लफ्जों में किसी दर्शन को व्यक्त करना ही सार्थक अभिव्यक्ति है। बधाई।

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    1. स्वागत व आभार रवीन्द्र जी !

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