शुक्रवार, फ़रवरी 14

ढाई आखर जिसने बांचे

ढाई आखर जिसने बांचे 



ढाई आखर जिसने बाँचे अंतर पिघल-पिघल बह जाये, अधरों पर स्मित नयन मद भरे एक रहस्य मधुर बन जाये ! कदमों में मीरा की थिरकन कानों में कान्हा मुरली धुन, यादें पनघट बनी डोलतीं घटता पी से मिलन प्रतिक्षण ! मानस के उत्तंग शिखर से भावों की इक नदी उतरती कण-कण उर का डूबे जिसमें धुली-धुली मनकाया हँसती ! खो जाता ज्यों नीलगगन में हंस अकेला उड़ता कोई, अंतर सागर में मिल जाता तृप्त हुआ दीवाना सोई !


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