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मंगलवार, अप्रैल 28

ठहरा मन उपवन प्रशांत है

ठहरा मन उपवन प्रशांत है 


छायी भीतर नीरव छाया 

 कब बिगाड़ पाती कुछ माया, 

ठहरा मन उपवन प्रशांत है 

छाया में विमल एकांत है !


उहापोह न शेष रही चाह 

मिली हरियाले वन में राह, 

छल-छल छलकें सोते जल के

बरस मेघ नीर नेह ढलके ! 


 भीतर छायी नीरव  छाया 

 कुछ बिगाड़ पाती कब माया,

मौन मुखर हो उस छाया में 

कहीं सुर वीणा, मृदंग बजे !


 नाद अनोखा अनुपम प्रकाश 

मिल जाये, है जिसकी तलाश, 

थम श्वास मंत्र कोई गाये 

कुदरत का हर रंग लुभाये !



 


 

शुक्रवार, नवंबर 7

अँधेरा और प्रकाश

अँधेरा और प्रकाश  


अंधेरे में बदल जाती हैं चीजें 

जो है 

वह नहीं दिखायी देता 

जो नहीं है 

वह नयी शक्लें धर लेता है 

अंधेरा भय जगाता है 

अंधेरा बाहर का हो या भीतर का 

परिणाम वही रहता है 

देख सके जो पार अंधेरे के 

ऐसी आँख जगानी है 

प्रकाश की एक नन्ही सी किरण 

उस पार से लानी है 

कितना भी बड़ा हो अँधेरा 

मिट जाएगा 

शांति और मौन की तरह 

छुपा प्रकाश बाहर आयेगा 

तब ज्ञात होगा

जो है 

वही तो प्रकट हो रहा है 

भीतर अज्ञान है 

तो मोह, क्रोध और भय की बेलें पनपेंगी 

कभी शोक सताएगा 

कभी घेर लेगा विषाद 

भीतर ज्ञान है 

तो आनंद की फसल लहलहायेगी !

किंतु जो मूल में है 

अंततः वही बच जाता है 

जो ओढ़ा हुआ है 

वह एक न एक दिन

 झर जाता है  

ओढ़ा हुआ अज्ञान 

भी उतर जाएगा 

और उस दिन 

जीवन पूरी तरह मुस्कुरायेगा !

रविवार, अक्टूबर 12

क्योंकि तुम ख़ुशी के परमाणुओं से बने हो

क्योंकि तुम ख़ुशी के परमाणुओं से बने हो 


जिसमें प्रेम के परमाणु भी हैं 

या वे बदल जाते हैं प्रेम में 

कई आयामी हैं वे 

जैसे प्रकाश की एक श्वेत किरण 

सात रंगों में टूट जाती है 

प्रिज्म से गुजरने पर 

आत्मज्योति में भी सात गुण छिपे हैं 

कभी प्रेम का लाल रंग 

मुखर हो उठता है चिदाकाश में 

जब भावनाओं के श्वेत निर्मल मेघ 

उमड़ते घुमड़ते हैं 

कभी शांति का नीलवर्ण 

शक्ति का केसरिया भी है यहाँ 

और ज्ञान का पीतवर्ण भी 

शुद्धता का बैंगनी रंग कितना मोहक है 

सुख की हरि फसल भी लहलहाती है 

अंतर  आकाश सुशोभित है 

इन सात रंगों से 

जहाँ से सात सुरों की गूंज भी आती है ! 


गुरुवार, मई 1

मिलन

मिलन 


जो ख़ुशबू बन साथ चला है 

उस से ही हर ख़्वाब पला है 


जीवन का जो सार दे रहा 

वही मधुर आधार दे रहा 


सीधा-सच्चा जिसका पथ है 

मिट जाती हर इक आपद है 


सारे शब्द दूर जा बैठे 

सुरति जहाँ दिल में आ पैठे 


गुंजन कोई गूँज रही है 

शुभ प्रकाश की नदी बही है 


 यामा-दिवस भेद मिटता है 

चारों याम मिलन घटता है 


मंगलवार, नवंबर 19

कोई

कोई 


कोई निकट ही नहीं 

बहुत निकट है 

पल-पल देख रहा है

देह की हर शिरा का स्पंदन 

प्राणों का आलोड़न 

मन का सहज आनंद 

झट ‘तथास्तु’ कह कर मुस्का देता है 

और वही देख चुका है 

देह की जड़ता 

प्राणों की आतुरता 

मन का रुदन 

पर तब हामी नहीं भरी थी  

प्रकाश की आस जगायी थी 

सहलाया था अदृश्य हाथों से 

घोर अंधेरों में !



मंगलवार, अक्टूबर 17

अबकी बार नवरात्रों में

अबकी बार नवरात्रों में 


तंद्रा, प्रमाद सताते हैं 

देह को अथवा मन को  

आत्मा सदा ही सचेतन है !

पर जैसे काली हो जाये चिमनी

 तो प्रकाश नहीं आता 

प्रमादी हो जाये देह या मन तो 

आनंद आत्मा का बाहर नहीं आता !

देह-दीपक जब साफ़ नहीं रहता 

तो मन-स्नेह कैसे भरा जाएगा उसमें 

देह दीपक में स्नेहिल मन हो 

तभी न आत्मा की ज्योति जगमगायेगी 

और देख वह जोत, अबकी बार 

नवरात्रों में माँ हमारे घर आएगी 

योग से देह-दीपक सजाना है 

ध्यान से मन-स्नेह जलाना है 

तब प्रकटेगी वह अखंड ज्योति 

जो अभी सोयी है 

अंधकार में भटक रोयी है !


शनिवार, जनवरी 21

वही मार्ग में संबल बनती


वही मार्ग में संबल बनती


मुख मोड़ा जब-जब प्रकाश से 

हर दुःख इक छाया सा मिलता,

परछाई इक सँग हो लेती 

तज खुद को जब जग को देखा !


बाधा जो सम्मुख आती है 

उसकी भी छाया बनती है,

कभी विषाद, विकार कभी बन  

माया बन जो गहराती है !


ज्योति का इक स्रोत है भीतर 

हम उससे मुख मोड़े रहते, 

पीठ किये इस झिलमिल करते

जग में विचरण करते रहते !


छायाएँ जब मिल आपस में 

नित्य नवीन  रूप धरती हैं, 

कुछ अभिनव कुछ भीत बढ़ातीं 

सदा साथ मन बन रहती हैं !


थम जाए यदि पल भर कोई 

मुड़ कर देखे स्वयं  स्रोत को, 

मन खो जाता तत्क्षण  जैसे 

चकित हुआ सा देखे खुद को !


सदा एक रस सदा साथ है 

ज्योति विमल  जो दिपदिप करती, 

जाने या ना जाने कोई 

वही मार्ग में संबल बनती !


मंगलवार, जनवरी 3

नया वर्ष - नए विकल्पों का घोष


नया वर्ष - नए विकल्पों का घोष 

जाते हुए वर्ष के अंतिम दिन और नए वर्ष के प्रथम दिन को प्रकृति के सान्निध्य में बिताने की परंपरा कब और कैसे आरम्भ हो गयी, यह तो याद नहीं पर पतिदेव की सेवा निवृत्ति से पूर्व की यह रीति कोरोना का एक वर्ष छोड़ दें तो पिछले तीन वर्षों से बखूबी चल रही है। इस वर्ष भी तीन महीने पहले ही पुत्र व पुत्रवधू ने ईको नेटिव विलेज नामक एक रिज़ॉर्ट में दो कमरे आरक्षित करवा दिए थे। अतः २०२२ का अंतिम दिवस और २०२३ का प्रथम दिवस पंछियों, वृक्षों और सूर्यास्त व सूर्योदय निहारते हुए बिताया। बंगलूरू की भीड़भाड़ से दूर गाँव के निकट खेतों-खलिहानों के मध्य दूर तक फैले खुले स्थान पर यह स्थान है। दूर से देखने तो पेड़ों से घिरा है, पर निकट जाकर देखने पर ज्ञात होता है कि अपनी उत्तम वास्तुकला के साथ ​​​​यह आवास शांत वातावरण में स्थित है और सुकून भरे कुछ पल बिताने के लिए एक सुरम्य गांव की पृष्ठभूमि पर बनाया गया है।घूमता हुआ चाक तो पहले कई बार देखा था पर पहली बार एक कुम्हार के सहयोग से चाक चलाने का अवसर मिला, हमने मिट्टी के दो छोटे पात्र बनाए। मिट्टी का कोमल स्पर्श अनोखा था, तेज़ी से घूमते हुए चाक पर अनगढ़ मिट्टी को भीतर व बाहर से सहेजते हुए आकार देना वाक़ई एक सुंदर अनुभव था। इसके बाद बचपन में खेले हुए अनेक खेलों की बारी थी, जिसमें शामिल थे, झूले, लट्टू घुमाना, लकड़ी की सहायता से टायर घुमाना, गुलेल से टंगी हुई टिन की बोतलों पर निशाना, पतंग उड़ाना, लगूरी, बास्केट बॉल, कैरम और भी कई खेल, जिन्हें बच्चे-बड़े मिल कर खेल रहे थे। जो काम वर्षों से नहीं किए होंगे, उन्हें  करके सहज आनंद मिल रहा था, वास्तव में आनंद तो भीतर है ही, उसे व्यक्त होने का अवसर मिल रहा था, वरना घर-बाहर के रोज़मर्रा के कामों में बड़े और पढ़ाई के बोझ तले दबे बच्चे अपने भीतर के उस आनंद से मिल ही नहीं पाते जो उन्हें इन सरल कृत्यों को कर के मिल रहा था। इस ख़ुशी का शायद एक कारण और भी हो सकता है, जीवन में नयापन उत्साह से भर देता है, तो ये सारे खेल जिन्हें आज की पीढ़ी भूल ही गयी है, उसी नवीनता का अनुभव करा रहे थे। जैसे परमात्मा नित नया सृजन करता ही जाता है, वह थकता ही नहीं। हमारे भीतर भी उसी का अंश आत्मा रूप में मौजूद है जो सदा नवीनता का अनुभव करना चाहता है। संभवतः इसीलिए दुनिया भर में लोग नया साल मनाते हैं। 

प्रकृति प्रेमियों के लिए इससे अच्छा क्या होगा कि वर्ष की अंतिम रात्रि को स्वच्छ आकाश में तारों की चमक और चंद्रमा की दमक निहारते हुए बिताया जाए। भोर में पंछियों कि कलरव से नींद खुले और उगते व अस्त होते सूर्यदेव को प्रणाम करने का अवसर मिले। नये  वर्ष का विशेष रात्रिभोज, संगीत, प्रकाश और साज-सज्जा तो सभी के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बना ही हुआ था। यहाँ दो दर्जन से ज़्यादा कमरे हैं और सभी भरे हुए थे। बच्चे, युवा, अधेड़ और वृद्ध सभी आयुवर्ग के लोग आए हुए थे, जिनमें से अधिकतर आपस में शायद पहली और अंतिम बार मिले थे, पर एक आत्मीयता का सहज भाव जग जाना स्वाभाविक था क्योंकि सभी एक ही उद्देश्य के लिए आए थे, अपने जीवन की इस संध्या को यादगार बनाने !

शाम होते ही भोज की तैयारी शुरू हो गयी थी। प्रकाश की झालरें, संगीत और स्वादिष्ट भोजन की सुगंध सबको कार्यक्रम स्थल पर ली आयी। कुछ मेहमानों ने गीत गाए, कुछ बच्चों ने नृत्य किए और जैसे ही घड़ी ने बारह बजाए, प्रांगण पटाखों से गूंज उठा।

अगले दिन सुबह उठे तो विभिन्न पक्षियों की मधुर आवाज़ें सारे वातावरण में गूँज रही थीं। अभी हल्का अंधेरा था, पर रिज़ोर्ट से बाहर निकल कर बाँए कच्चे रास्ते पर चलना आरंभ किया तो धीरे-धीरे प्रकाश फैलने लगा था। आसपास के खेतों व पगडंडी पर श्वेत कोहरा छाया था, पथ के अंत तक हम चलते गए, रास्ते में कुछ फूलों के पेड़ थे। पगडंडी की समाप्ति पर किसी का घर था, या कोई गेस्ट हाउस। वापसी में बाँयी तरफ़ श्वेत कोहरे को भेदती हुई हल्की सी लाल आभा की झलक दिखी; और देखते-देखते नारंगी रंग का सूर्य का गोला श्वेत पृष्ठभूमि पर देदीप्यमान हो उठा। हमने कुछ तस्वीरें उतारीं और कुदरत को निहारते वापस लौट आए। प्रातःराश  के बाद वहाँ से लौटने से पूर्व अंतिम बार पूरे अहाते का एक चक्कर लगाया। कमल कुंड में कलियाँ खिलने लगी थीं। टमाटर, लौकी, फलियाँ, बैंगन, मिर्च, पपीते के पौधे और पेड़ देखे। यहाँ कुछ गाएँ और बत्तखें भी पाली हुई हैं। एक बैल गाड़ी भी खड़ी थी। एक तरह से गाँव का पूरा वातावरण बनाया गया है। 

शहर लौटकर अवतार २ देखने का कार्यक्रम भी पहले से ही तय था। इस फ़िल्म में समुंदर के नीचे की दुनिया का अद्भुत चित्रण किया गया है। पानी की लहरों के साथ नीचे उतरते -तैरते हुए काल्पनिक दुनिया के पात्र वहाँ के जीवों और वनस्पतियों से कैसा आत्मीय संबंध जोड़ लेते हैं, यह देखते ही बनता है। जीवन इतना अद्भुत हो सकता है, एक ओर इसकी कल्पना जहाँ चेतना को ध्यान की ओर ले जाती है, वहीं दूसरी ओर बन्दूकों और बारूद के विस्फोट से विनाश की लीला मानव की लिप्सा के प्रति सजग भी करती है। जेक सली के अनोखे परिवार और विशालकाय मछलियों के दृश्यों को मन में अंकित किए जब हम हॉल से बाहर आए तो सड़क पर ट्रैफ़िक कुछ ज़्यादा ही था। कुशलता से गाड़ी को भीड़ से निकाल कर घर तक पहुँच कर घड़ी देखी तो रात्रि के आठ बज चुके थे। बच्चों ने खाना पहले ही ऑर्डर कर दिया था, जो पहुँच चुका था। इस तरह नए वर्ष का पहला दिन अविस्मरणीय बन गया है और आने वाले पूरे वर्ष के लिए प्रेरणा का एक स्रोत भी; अर्थात अपने रोज़मर्रा के कामों में से कुछ समय निकाल कर  पाँच तत्वों के साथ कुछ समय बिताना, प्रकृति के साथ आत्मीय संबंध अनुभव करना और परमात्मा के द्वारा मिले परिवार के साथ सहज प्रेम के वरदान को कृतज्ञता के साथ ग्रहण करना !

शुक्रवार, अक्टूबर 21

दीपावली

दीपावली 


दिव्य प्रकाश, उजास, बिखेरे 

दीपावली तमस हर लेती,  

द्युति, आलोक, ज्योति, उजियारा

हर कोना जगमग कर देती !


माटी के दीपों का वैभव 

अंतर बाहर करे प्रकाशित,

 दीप्ति झर रही तिमिर तिरोहित 

लख हर नयन हुआ आनंदित !


दीप शिखा संकल्प जगाए 

जीवन पथ आलोकित करती, 

दैदीप्यमान स्वतः प्रज्जवलित

आत्मदीप में आभा भरती  !


गुरुवार, सितंबर 16

चाह और प्रेम


चाह 


हर चाह नश्वर की होती है 

शाश्वत को नहीं चाहा जा सकता  

वह आधार है चाहने वाले का 

हर याचक आकाश से उपजा है 

और पृथ्वी की याचना करता है 

पृथ्वियां बनती-बिगड़ती हैं 

आकाश सदा एक सा है 

याचक नहीं जानता खुद का स्रोत 

वह अंधकार में टटोलता है 

प्रकाश का नहीं उसे बोध 

पृथ्वी घूम रही है 

इसका भी नहीं प्रबोध ! ​​


प्रेम 


प्रेम की डोर 

जो हमें बांधती है 

एक दूजे से 

टूटने न पाए 

यही आधार है 

प्रेम पंख देता है 

उड़ने को तो सारा आकाश है 

विश्वास की आंच में 

इसे पकना होता है 

और समर्पण की छाँव में 

पलना होता है 

प्रेम की डोर बांधे रहे परिवार 

समाज और राष्ट्रों को 

तभी जीवन का फूल महकता है !

शुक्रवार, अगस्त 6

मौन समर्पण



मौन 


प्रकाश कहा नहीं जाता 

अंधकार की कहे कौन ?

असीम शब्दों में नहीं समाता 

अच्छा है रहें मौन 

 मुखर जब मौन होगा 

सुवास बन खुद बहेगा 

चकित हुआ मन जहाँ 

मधु रस में पगेगा 



समर्पण 


हो समर्पित उर उन्हीं चरणों पे ऐसे 

धूलि जिनकी करे पावन 

बन सके फिर मन यह दर्पण 

 झलक जाए जग यह सारा 

पर छू न पाए एक कण भी 

तैरता इक जल के ऊपर 

हो अछूता कमल जैसे 

हो समर्पित उर किन्हीं कदमों में ऐसे 

मार्ग पाए चल पड़े फिर 

भूलकर सारी व्यथाएँ 

एक ही पथ चुन ले राही 

 कदम फिर उस पर बढ़ा दे  

इक तने पर खड़ा है वट 

अनगिनत शाखाएँ धारे 


शुक्रवार, मई 21

प्रसाद

प्रसाद 


बरस रहा है कोई अनाम जल 

जो भिगोता है भीतर-बाहर सब कुछ 

भीग जाता है हर कोना कतरा अंतर  का 

तरावट से भर जाती है मन की माटी

इसका कोई स्रोत नजर नहीं  आता 

पर भर लेती है अपने आगोश में 

 प्रकाश की एक धारा 

बरसती है अकारण कभी-कभी 

शायद सदा ही 

पर नजर आती है कभी-कभी 

जाने क्यों !

शायद वह किसी का सन्देश लाती है 

अंतर को भरने आती है 

प्रेम और करुणा से 

सूना न रहे एक क्षण के लिए भी मन का घट

बहती रहे पुरवाई सदा मन के आंगन में 

वह जताने आती है अकेले नहीं हैं हम 

हर पल कोई साथ है 

 भर देती है अनोखी सिहरन रग-रग में 

 कर देती पावन शब्दों को भी अपने परस से 

कैलाश के हिमशिखरों सा 

 या गंगा के शीतल निर्मल जल जैसा  

मानसरोवर में तैरते हंसों की तरह 

अथवा उषा की लालिमा में छायी सूर्य की प्रथम रश्मि सी  

वह एक नजर है किसी गुरू की 

जो हर लेती है सारा विषाद शिष्य के अंतर का 

या एक स्पर्श  है माँ के हाथों का 

अथवा तो पिता का सबल आधार है 

जो शिशु को डिगने नहीं देता 

इन सबसे बढ़कर वह सहज प्रेम है 

या उसमें सब कुछ समाया है 

वह किसी सीमा में नहीं बंधता 

उसे मापा नहीं जा सकता  

वह अज्ञेय है 

अपार है, अनंत है 

तो फिर यही कह दें 

वह ‘उसी’ का प्रसाद है !