बुधवार, अप्रैल 22

रहे जागरण भीतर प्रतिपल

रहे जागरण भीतर प्रतिपल

मन उपवन निशदिन सजा रहे

नहीं उग पाए खर-पतवार,

मंजिल की बाधा बन जाये 

जमे न ऐसा कोई विचार !

 

आशा के कुछ पुष्प उगायें, 

पोषण दे, ऐसा ही सोचें,

कंटक चुन-चुन बीनें पथ से, 

सदा अशुभ को बाहर रोकें !

 

प्रज्ञा की सुंदर बेलें  हो, 

दृढ़  इच्छाओं के वृक्ष लगे,

 धार प्रेम की बहती जाये 

मेधा,प्रज्ञा की ज्योति जगे !

 

अपसंस्कृति को प्रश्रय मत  दें 

सुसंस्कृति सदा  फैले-फूले, 

तहस-नहस न कभी हो उपवन 

जीवन सबके निशदिन महकें !

 

नया-नया सा नित विचार हो 

भीतर शुभ ज्ञान  तृषा जागे, 

जिज्ञासा जागृत हो मन में 

मन भय से दूर नहीं भागे !

 

रहे जागरण भीतर प्रतिपल 

प्रतिपल श्रद्धा कर लें अर्जित,

आगे ही आगे बढ़ना है 

भीतर हो अखंड स्मृति वर्धित !


 

1 टिप्पणी:

  1. आशा के कुछ पुष्प उगायें, पोषण दे, ऐसा ही सोचें, कंटक चुन-चुन बीनें पथ से,
    सदा अशुभ को बाहर रोकें।बहुत प्रेरक और मार्गदर्शक कविता रची है आपने।

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