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मंगलवार, जुलाई 7

उसने अपनी याद जरा सी

उसने अपनी याद जरा सी 


जब नयनों में नींद नहीं थी 

उसका ही तो ख़्वाब बसा था, 

सुमधुर स्मृतियों के पत्तों से 

मन का आँगन पूर्ण भरा था !


अधरों पर मुस्कान सजीली 

ह्रदय की गहराई में तोष,

आश्वासन थपकी देता था 

लोरी गा रहा था संतोष !


फिर जाने कब निद्रा देवी 

पलकों पर आकर बैठी थी,   

उसने अपनी याद जरा सी 

शायद पीछे खिसका दी थी !


तन सोया ऊर्जा जगती थी 

कंपन सिहरन रह-रह होता, 

एक अखंड ज्योति जलती जब  

क्योंकर दर्श न उसका होता !


उसके पथ पर जो चलता है 

नित उपहार मिला करते हैं,

नींद, जागरण, स्वप्न सभी के 

जाकर पार मिला करते हैं !


शुक्रवार, फ़रवरी 21

मन

मन 


नींदों के पनघट पे 

यादों को बुनता है, 

ख़्वाबों के झुरमुट में 

शब्द पुष्प चुनता है !


भावों की माला रच 

ताल में पिरोता है, 

अर्पित कर चरणों में 

अश्रु में भिगोता है !


जाने क्या पाएगा 

गीत रोज़ गाता है, 

तारों से बात करे 

चंदा संग जगता है !


किसकी वह राह तके 

किसको पुकारे सदा, 

शब्दों की नाव बना 

मन, सागर तिरता है !


गुरुवार, मार्च 30

एक आभा मय सवेरा



एक आभा मय सवेरा

नींद टूटे, जोश जागे 
हृदय से हर सोग भागे, 
याद में हो मन टिका जब 
टूटते हैं मोह धागे !

प्रेम का सूरज दमकता 
ज्योत्सना बन शांति छाए, 
एक आभा मय सवेरा 
तृप्ति की हर रात लाए !

मुक्त उर से गीत फूटे 
कर्म की ज़ंजीर बिखरे,
मिले जग को प्राप्य उसका 
रिक्त मन की गूंज उतरे !

आस का  दीपक न बुझता 
सहज सम्मुख मार्ग दिखता, 
नहीं मंज़िल दूर कोई 
हर घड़ी वह मीत मिलता !

हर कहीं मौजूद है वह
समय केवल एक भ्रम है, 
कल वही था आज भी है 
वहाँ था जो यहाँ भी है !

शनिवार, जुलाई 9

फलसफा मन का

फलसफा मन का


कह रहा है कोई कब से 

सुनो सरगोशियाँ उसकी 

बेहद महीन सी आवाज़ 

पुकारे है जिसकी 

शोर ख़्वाहिशों का दिल में 

थम जाए जिस घड़ी 

 इक पुर सुकून पवन 

आहिस्ता से छू जाती  

कोई कशिश, तलाश कोई 

अनजान राहों पर लिए जाती  

वह जो अपना सा लगे 

 याद जिसकी बरबस सताती  

चैन उसकी पनाह में है 

यह राज अब राज नहीं 

 भुलाना नहीं मुमकिन 

क्या दिल को यह अंदाज नहीं 

उसकी फ़िक्रों  में नींद रातों की गंवायी 

जिक्र उसका हर नज्म में जो भी गायी 

रहे  उस गली में वही

समाते जहाँ दो नहीं 

हवा है, धूप या 

पानी का कतरा 

सबब जीवन का 

या फलसफा मन का !




सोमवार, मार्च 28

स्वप्न और जागरण

स्वप्न और जागरण 

मन केवल नींद में  ही नहीं देखता स्वप्न

दिवा स्वप्न भी होते हैं 

जागती आँखों से देखे गए स्वप्न 

बात यह है कि 

खुद से मिले  बिना नींद खुलती ही नहीं 

या कहें कि खुद से बिछुड़ना 

है एक स्वप्न  

जो हर कोई देख रहा है 

अंतर में जगना जब तक नहीं हुआ 

 सोया ही हुआ है

अर्थात् इस या उस स्वप्न में खोया ही हुआ  है 

हर कोई  निर्माता है

निज सृष्टि का 

 दृष्टिकोण, विचार, मान्यताओं 

और धारणाओं की दीवारों से 

अपना महल सजाता है 

देखकर भी असलियत को 

नज़रें चुराता है 

जो करणीय है वह कल पर टाले जाता है 

हर कोई  क़ैद है 

अपने ही बनाए मायाजाल में

खुद से बिछुड़े हुए हम इक दिन तो जागेंगे 

उस क्षण से पूर्व नहीं हमारे दुःख भागेंगे 

स्वयं की अनंतता का अनुभव ही काम आएगा 

भीतर का प्रकाश ही ज्योति दिखाएगा ! 


सोमवार, जनवरी 24

श्वासों की माला जपनी थी

श्वासों की माला जपनी थी


जो हीरे तूने सौंपे थे 

पत्थर सम हमने गँवा दिए, 

अमृत की खानें छिपी भीतर 

भयभीत गरल से कंपा किए !


शीतलता भरता था सुमिरन 

जग की आँधी में उड़ा दिया, 

श्वासों की माला जपनी थी 

सपनों, नींदों में भुला दिया !


तू रहबर बनकर बैठा था 

आवाज़ लगाते हम रोए, 

कब तूने त्यागा था हमको 

रस्तों पर हम ही खोए थे !


रंगीनी, दुनिया की माया 

कुछ और नहीं मन है छाया, 

तू था प्रकाश का स्रोत खड़ा 

हम पीछा करते थे मन का !


जिसका ना रूप कभी ठहरे 

उस दुनिया के पीछे भागे, 

कब सपने झूठे छोड़े थे 

कब तेरी करुणा लख जागे !


तुझको पाया कोई कहता 

तू मुँह फेर हंसता होगा, 

पाना उसका जो खोया हो 

तू कण-कण में रमता होगा !


हम अनजाने से बन जाते 

तू कदम-कदम पर बिखरा है, 

तेरी आभा से रवि दमके 

चंदा रूप भी संवरा है !


शुक्रवार, नवंबर 26

जाग भीतर कौन जाने

जाग भीतर कौन जाने  


एक का ही है पसारा

गुनगुनाता जगत सारा,

निज-पराया, अशुभ-शुभता,

स्वप्न में मन बुने कारा !


मित्र बनकर स्नेह करता 

शत्रु बन खुद को डराता, 

जाग कर देखे, कहाँ कुछ ?

सकल पल में हवा होता !


जगत भी यह रोज़ मिटता 

आज में कल जा समाता, 

अटल भावी में  यही कल 

देखते ही जा सिमटता !


नींद में किस लोक में था 

भान मन को कहाँ होता,   

जाग भीतर कौन जाने  

खबर स्वप्नों की सुनाता !


अचल कोई कड़ी भी है  

जो पिरोती है समय को, 

जिस पटल पर ख़्वाब दिखते 

सदा देती जो अभय को !


क्या वही अपना सुहृद जो 

रात-दिन है संग अपने, 

जागता हो हृदय या फिर 

रात बुनता मर्त्य सपने !


शनिवार, सितंबर 4

नींद

नींद 


हर रात हम अपने घर जाते हैं 

अनजाने ही 

और भोर में पोषित होकर लौटते हैं 

जाहिर है घर पर कोई है 

यदि रात सो न सका कोई

तो वह घर का पता ही भूल गया है 

या भटक गया है आधी रात को 

अथवा घर से दूर निकल गया है 

जाना चाहता है 

पर कोई वाहन नहीं मिलता 

भय और थकान भी उसे घेर लेते हैं 

नींद न आने पर अगले दिन 

लोग कैसे खोये-खोये से रहते हैं !


मंगलवार, जनवरी 5

नींद में ही सही...

नींद में ही सही...
कुछ स्मृतियाँ कुछ कल्पनाएँ 
बुनता रहता है मन हर पल 
चूक जाता है इस उलझन में 
आत्मा का निर्मल स्पर्श....
 यूँ तो चहूँ ओर ही है उसका साम्राज्य 
 घनीभूत अडोल वह है सहज ही ज्ञातव्य 
 पर डोलता रहता है पर्दे पर खेल 
मन का अनवरत 
तो छिप जाती है आत्मा 
असम्भव है जिसके बिना मन का होना
उसके ही अस्तित्त्व से बेखबर है यह छौना
नींद में जब सो जाता है मन कुछ पल को 
आत्मा ही होती है भीतर 
तभी नींद सबको इतनी प्यारी है 
नींद में ही हो जाती है खुद से मुलाकात 
 पर अफ़सोस ! नहीं हो पाती तब भी उससे बात 
जागरण में तो दूर हैं ही उससे 
शयन में भी हो जाते हैं दूर उससे 
कब होगा वह ‘जागरण’ 
जब जगते हुए भी प्रकटेगी वह और नींद में भी.... 
 

गुरुवार, अक्टूबर 15

सिंधु से नाता जोड़ लें

 सिंधु से नाता जोड़ लें

नींद टूटे, स्मरण जागे 

फिर खिल उठे मन का कमल  

 जो बन्द है मधु कोष बन  

   हो प्रकट वह शुभता अमल !


हम बिंदु हैं तो क्या हुआ 

सिंधु से नाता जोड़ लें, 

इक लपट ही हों आग की 

रवि की तरफ मुख मोड़ लें !


अब शक्ति को पहचान निज 

खिल कर उसे बह लेने  दें, 

जो सुप्त है कई जन्म से 

हो व्यक्त सब कह लेने दें !


बुधवार, सितंबर 9

जरा जाग कर देखा खुद को

जरा जाग कर देखा खुद को 

 

स्वप्न खो गए जब नींदों से 

चढ़ा प्रीत का रंग गुलाल, 

दौड़ व्यर्थ की मिटी जगत में 

झरा हृदय से विषाद, मलाल !

 

द्रष्टा  बन मन जगत निहारे 

बना कृष्ण का योगी,अर्जुन,

कर्ता का जब बोझ उतारा

कृत्य नहीं अब बनते बन्धन !

 

श्वास चल रही रक्त विचरता 

तन अपनी ही धुन में रमता, 

क्षुधा उठाते प्राण, तृषा भी 

कहाँ साक्षी कुछ भी करता !

 

जरा जाग कर देखा खुद को 

सदा पृथक जग से पाता है, 

युग-युग से यह खेल चल रहा 

विवर पात सा उड़ जाता है !

 

वृक्ष विशाल, गगन को छूते  

क्या करते वे, सब होता है, 

जग यूँ ही डोलेगा कल भी 

बोझ न उर पर वह ढोता है !

 

 

सोमवार, मई 11

स्वप्न

स्वप्न 

 स्वप्न टूटा, नींद टूटी, कर्म छूटे 
स्वप्न जारी, नींद प्यारी, कर्म बंधन 
स्वप्न में ही किले बनते और ढहते 
स्वप्न में ही लोग हँसते और रोते
भय के बादल खूब बन-बन कर बरसते 
कामनाओं के समंदर बहा करते 
डूबते जिनमें कभी भँवरों में फँसते 
पत्थरों से कभी टकरा चूर होते
कल्पनाओं में बने राजा चमकते 
स्वप्न है यह जिंदगी कब देख पाते 

स्वप्न में खो स्वयं ही नव रूप धरते  
एक होकर भी अनेकों नजर आते 
नींद गहरी यूँ लुभाती व सुलाती 
जागकर भी उन्हीं गलियों में भटकते 
कर्म हर होता तभी तक स्वप्न जब तक चल रहा है 
नींद से जागे न जब तक स्वप्न तब तक चल रहा है 




गुरुवार, अप्रैल 9

नींद


नींद 


कल रात फिर नींद नहीं आयी 
नींद आती है चुपचाप 
दबे पावों... और कब छा जाती है 
पता ही नहीं लगने देती 
कई बार सोचा 
नींद से हो मुलाकात 
कुछ करें उससे दिल की बात 
प्रतीक्षा ही प्रतीक्षा थी 
उसके आने की कहीं दूर-दूर तक आहट नहीं थी 
नींद आने से पहले ही होश को सुला देती है 
स्वप्नों में खुद को भुला देती है 
कभी पलक मूँदते ही छा जाती है खुमारी 
अब जब करते हैं उसके स्वागत की तैयारी
तो वह छल करती है 
वही तो है जो रात भर तन में बल भरती है 
चहुँ ओर दौड़ते मन को चंद घड़ी देती है विश्राम 
जहाँ इच्छाओं का जमावड़ा बना ही रहता है 
कोई न कोई अड़ियल ख्याल खड़ा ही रहता है 
जहाँ विचारों के हवा-महल बनते बिगड़ते हैं 
पल में ही मन के उपवन खिलते-उजड़ते हैं 
नींद की देवी चंद घड़ियां अपनी छाया में पनाह देती है 
पर कल रात वह रुष्ट थी क्या 
जो भटके मन को घर लौटने की राह देती है ! 


सोमवार, फ़रवरी 17

सोये हैं हम

सोये हैं हम... 


बस जरा सी बात इतनी 
सुख की चादर ओढ़ मन पर 
खोये हैं हम 
सोये हैं हम !
एक सागर रौशनी का 
पास ही कुछ दूर बहता 
पर तमस का आवरण है 
कह इसे कई बार 
यूँ ही रोये हैं हम…!
नींद में भी जागता मन 
फसल स्वप्नों की उगाता 
जाने कितने बीज ऐसे 
बोये हैं हम !
नींद उसकी जागरण भी 
चंचला मति आवरण भी 
जाग देखें कैसी 
भावना सँजोये हैं हम !

मंगलवार, अक्टूबर 29

वर्तमान का यह पल

वर्तमान का यह पल 

घट रहा है जीवन अनंत-अनंत रूपों में 
 वर्तमान के इस छोटे से पल में 
सूरज चमक रहा है इस क्षण भी 
अपने पूरे वैभव के साथ आकाश में 
गा रहे हैं पंछी.. जन्म ले रहा है कहीं, कोई नया शिशु 
फूट रहे हैं अंकुर हजार बीजों में 
गुजर रही है कोई रेलगाड़ी किसी सुदूर गांव से 
निहार रही हैं आँखें क्षितिज को किसी किशोरी की जिसकी खिड़की से 
वर्तमान का यह पल नए तारों के सृजन का साक्षी है 
पृथ्वी घूम रही है तीव्र गति से सूर्य की परिक्रमा करती हुई 
यह नन्हा क्षण समेटे है वह सब कुछ 
जो घट सकता है कहीं भी, किसी भी काल खंड में 
सताया  जा रहा है कोई बच्चा 
और  दुलराया भी जा रहा हो
कोई वृक्ष उठाकर कन्धों पर ले जा रहे होंगे कुछ लोग 
कहीं तोड़ रहे होंगे फल कुछ शरारती बच्चे 
इसी क्षण में रात भी है गहरी नींद भी 
स्वप्न भी, सुबह भी है भोर भी 
जो जीना चाहे जीवन को उसकी गहराई में 
जग जाए वह वर्तमान के इस पल में 
जिसमें सेंध लगा लेता है अतीत का पछतावा 
भविष्य की आकांक्षा, कोई स्वप्न या कोई चाह उर की 
हर बार चूक जाता है जीवन जिए जाने से 
हर दर्द जगाने आता है 
कि टूट जाये नींद और जागे मन वर्तमान के इस क्षण में...