थामे क्यों तुम तम का छोर
छुप छुप कर वह झांक रहा है
हौले हौले कदम उठाता,
होकर भी जो ना होने का
इस दुनिया का भरम निभाता !
दूर असत् से करो हमें तुम
सत् की चाह जगी है मन में,
सदियों से सुनता यह विनती
सत् देखे ना वह जीवन में !
अंधकार नहीं भाता है
ले चल तू प्रकाश की ओर,
सुन के वह अचरज करता है
थामे क्यों तुम तम का छोर !
मृत्यु नहीं अमरता वर दो
युग-युग से मानव ने गाया,
नित विनाश का खेल चल रहा
नजर नहीं उसको यह आया !
‘जो है केवल वही, वही है
जो नहीं है भ्रम है भारी,
कोमल सी इक मृदु अनुभूति
छवि उसकी सुखद है न्यारी !